आलेख

 कलाओं की ओर बढ़ता गाजियाबाद 
( अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद-2013 के विशेष सन्दर्भ में )  

डॉ.लाल रत्नाकर         
          
इस वर्ष के अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद की चर्चा हो उससे पहले हमें गाजियाबाद में कलाओं के उद्भव को जानना लाजिमी होगा, गाजियाबाद देश की राजधानी दिल्ली (राष्ट््रीय राजधानी क्षेत्र) के करीब का शहर होने के साथ साथ उत्तर प्रदेश का एक औधोगिक शहर है इसका विकास जितने अल्प समय मे हुआ है निश्चित रूप से यह प्रतीत होता है कि भविष्य मे यह शहर विभिन्न विधाओ का केन्द्र बनेगा। ऐसे मे समय की मांग है कि इस शहर मंे कला एंव सांस्कृतिक गतिविधियों का विकास हो। अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद के तत्वाधान में 2004,2005,2006 के उपरान्त इस वर्ष 2013 का आयोजन कई मायने में गाजियाबाद की कला के विकास में मील का पत्थर सावित हुआ है।  लम्बे अन्तराल के उपरान्त गाजियाबाद में अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद-2013 का आयोजन इसलिए सम्भव हो पाया क्योंकि कलाप्रेमी श्री संतोष कुमार यादव का संरक्षकत्व मिला निश्चित रूप से यह अवधारणा पुर्नस्थापित हुयी कि कलाआंे के समुचित विकास के लिए संरक्षकत्व की महति आवश्यकता है। गाजियाबाद जहां नगरीय विकास की अपनी अवधारणा में प्रगतिगामी है, वैश्विक मान्यताओं के अनुरूप अपना स्वरूप गढ़ने में अग्रणी है यद्यपि उनका उद्येश्य व्यवसायिक ही है, पर भले ही आज उन्हें इसबात की जरूरत महसूश न हो पर कहीं न कहीं हमें हमारी उन परम्पराओं को भी जीवित रखते हुए उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इन्हीं उद्येश्यों की पूर्ति के लिए सांस्कृतिक गतिविधियां बढ़ाई जानी आवश्यक हैं, जिसे प्रशासन ने एक आयाम दिया है जिसमें ‘कलाधाम’ का निर्माण ही इन्हीं उद्येश्यों की पूर्ति के लिए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण गाजियाबाद द्वारा कराया गया है।

हमेशा की तरह इसबार भी देश के कोने कोने से मूर्तिकारों एवं चित्रकारों की एक बड़ी टीम जिसमें युवा एवं वृद्ध समान रूप से शरीक हुए हैं जिनका उल्लेख आगे किया जाएगा। इस कला उत्सव में मूर्तिकारों को अधिक समय और चित्रकारों को अपेक्षाकृत कम समय की जरूरत होती है इसीलिए मूर्तिशिल्पी फरवरी,24,2013 को ही आ गए जिससे वह अपना कार्य समय से आरम्भ कर सकें और तय समय के भीतर पूरा कर लें। अतः मूर्तिकला कार्यशाला के आयोजन का आरम्भ फरवरी,25,2013 को 11 बजे मुख्य अतिथि के रूप में पधारे पद्मश्री राम वी. सुतार के करकमलों द्वारा हुआ जिसकी अध्यक्षता संतोष कुमार यादव, उपाध्यक्ष, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने की संरक्षकत्व का दायित्व एस.वी.एस. रंगाराव जिलाधिकारी गाजियाबाद ने निर्वहन किया, इस अवसर पर सुश्री किरन यादव यातायात पुलिस अधीक्षक एस.वी राठौर एवं डी.पी.सिंह विशेष कार्याधिकारी गा.वि.प्रा. ने इस    निहायत सादे समारोह में अतिथियों को उनके किट और पुष्पगुच्छ प्रदान किए। तद्परान्त मुख्य अतिथि पद्मश्री राम वी. सुतार ने इस अवसर पर मूर्तिकला कार्यशाला का शुभारम्भ एक विशाल शिला पर अपने कुशल शिल्पी अन्दाज में जिस सधे अन्दाज से आघात लगाए तो कलाधाम का प्रांगण फिर से उस अट्हास से उन्मादित हो उठा इस अवसर पर राजस्थान से बुलाए गए मूर्तिकारों के सहायकों का भी स्वागत किया गया। नगर से पधारे कला प्रेमी, पत्रकारगण, कला विद्यार्थियों एवं गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अधिकारीगण, अभियन्तागण, अभियन्त्रण सेवाओं एवं अन्य कर्मचारीगण के सम्मुख मूर्तिकारों ने अपनी शिलाओं को चिन्हित किया। संयोजकत्व एवं सहभागी मूर्तिकार का दायित्व भी लेखक ने निर्वहन किया एवं कार्यक्रम का संचालन डा.प्रकाश चैधरी ने किया।  

मूर्तिकारों ने अपने किट से एप्रिन निकाले पहने स्केच बुक पर कुछ आडी तिरछी रेखाएं खींचनी आरम्भ की, फिर क्या था कलाधाम परिसर में हथौड़े और छेनियों की झनकार और ग्राईण्डरों का शोर उनसे निकलते हुए आकार दर्शकों की जिज्ञासा और काले मार्बल में बनते आकार कलाकारों की चहल कदमी आपसी हालचाल और उनके काम का हल्का से आकलन फिर क्रेन से शिलाओं का नियन्त्रण इस प्रकार आरम्भ हुयी मूर्तिकलाओं की कार्यशाला। पूरे परिसर में संगीतलहरी के साथ सर्द हवाएं सायंकाल तक कोई रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। दर्शकों का कौतुहल बना हुआ है आकार दिखाई तो दे रहे हैं पर वे आकलन नहीं कर पा रहे हैं क्या बनेगा, एक तरफ से हताश दूसरे मूर्तिकार से वही सवाल क्या बना रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि इनमें असली मूर्तिकार कौन हैं, जो शिलाओं को तोड़ रहे हैं या जो उन्हें निर्देशन कर रहे हैं, अद्भूद संगम है।  यहां यह बताना जरूरी है कि अब तक जितने भी कैम्प यहां आयोजित हुए हैं उनमें काला मारबल ही प्रयोग किया गया है। आइए बताते हैं कौन कौन हैं इसबार के मूर्तिकार और ये कहां से यहां आए हैं -  पहले चलते हैं तारक ‘दा’ के पास इनका पूरा नाम है श्री तारक गरई यह कोलकाता से आए हैं ये इससे पहले भी सम्पन्न कला उत्सव में शरीक रहे हैं 2006 और 2007 स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाले समकालीन मूर्तिकार हैं अन्र्तराष्ट््रीय ख्यातिलब्ध तारक दा शान्ति निकेतन से कला की शिक्षा के बाद अपनी एक पहचान बनाए हैं, सभी माध्यमों में बंहुत ही निपुणता से कार्य में दक्ष हैं साथ ही अन्य कलाओं में भी अपनी दखलंदाजी रखने वाले दादा सरल और मृदुल स्वभाव के व्यक्ति हैं। 2006 के कैम्प की इनकी एक समूह प्रतिमा जिसमें तीन प्रतिमाएं बनायी गयी थीं जिन्हें कलाधाम में स्थापित करते समय अलग अलग कर दिया गया जिससे उसकी भव्यता तो कम ही हुई और अर्थहीन भी हो गयी, इससे दादा को पता चला तो बहुत दुख हुआ, संयोजक के नाते मैंने पुनः उन्हें गाजियाबाद आने के लिए राजी किया, जब यह बात उपाध्यक्ष महोदय को पता लगी तो उन्होंने दादा को आश्वस्त किया कि इसे संयोजित कर समुचित और उपयुक्त स्थान पर लगवाया जाएगा। इसबार दादा ने तीन विशाल शिलाखंड लगभग 10 फुट ऊंचाई का वरण किया और उनको संयोजित कर ‘बुद्ध’ का विशाल चेहरा निरूपित किया, इसे बनाने में तीन सहयोगी कारबरों के साथ 15 दिनों तक निरन्तर कार्य किए। इसी क्रम में उन्होने एक और शिलाखंण्ड को आकार दिया जिसका नाम ‘कृष्ण’ रखा। दादा का गाजियाबाद से बहुत ही अपनेपन का सम्बन्ध हो गया है उन्हें यहां कला के विकास की असीम सम्भावनाएं दिखती हैं। यही तो बात है जिसके लिए उन्होने मूर्तियों के एक पार्क की मांग कर डाली। 

सी.पी.चैधरी उदयपुर राजस्थान से हैं यह राष्ट््रीय स्तर के वरिष्ठ मूर्तिकार हैं यह गाजियाबाद के अखिल भारतीय कला उत्सव में पहली बार शरीक हुए इन्होंने ‘खिड़की’ की रचना की है।  रतन लाल कन्सोडरिया अहमदाबाद गुजरात के जानेमाने मूर्तिकार हैं यह पहलीबार गाजियाबाद के अखिल भारतीय कला उत्सव में सिरकत किए हैं इन्होंने यहां जल संरक्षण पर अपना शिल्प तैयार किया हैं।  नागप्पा प्रधानी बंगलौर कर्नाटक से है विश्वभारती कला निकेतन शान्तिनिकेतन से शिक्षा लेकर के कला महाविद्यालय बंगलौर कर्नाटक मूर्तिकला विभाग में प्राध्यापक हैं पहलीबार गाजियाबाद के अखिल भारतीय कला उत्सव में शरीक हुए हैं ‘कम्पोजिशन’ नाम से आधुनिक शिल्प बनाया है।   शिब प्रसाद बरार रायपुर छत्तीसगढ़ से आए ‘मदरचाईल्ड’ शीर्षक से एक शिल्प तैयार किए हैं।  अशोक कुमार महापात्रा पुरी उड़ीसा से हैं इन्होंने ‘मूर्तिकार’ परम्परागत शैली में बनाया है।  सुशान्त कुण्डू मुम्बई महाराष्ट्र् से आए ये गाजियाबाद के कला आन्दोलन के सक्रिय युवा है मूर्तिकला कैम्प की तैयारी में हमेशा से इनका सहयोग रहा है, पहले गाजियाबाद आ जाना और सबसे बाद में जाना। युवा मूर्तिकार के नाते समकालीन कला पर गहरी पकड़, रचना की कसौटी पर खरे सुशान्त मेरे इस आयोजन के प्रमुख हिस्से से हो गए हैं।  पी.इलाचेन्झियन युवा मूर्तिकार हैं तमिलनाडु से पधारे चेन्झियन अनेक माध्यमों में दक्ष हैं इनके मेटल के काम तो बहुत ही गजब के हैं। यहां पर जो वृषभ इन्होंने बनाया है अब वह पुराने बस अड्डे के चैराहे पर विराजमान है।  नीलेश शिन्दे नागपुर महाराष्ट््र के युवा मूर्तिकार हैं गाजियाबाद पहलीबार आना हुआ पर अपने कौशल का प्रदर्शन जिस शिलाखण्ड में दिखाया है वह समकालीन मूर्तिशिल्प का नमूना है जिसे ‘सूरज और चांद’ शीर्षक दिया है।  परमिन्दर सिंह सन्धू पंजाब से आए और पहाड़ सी शिला चुनी और गढ़ दिया उसे जिसके अर्थ तलासते रहें लोग।  शिवान और कुमार सन्तोष जो गाजियाबाद से हैं ने भी आकृतियां तराशी हैं।  इन सब के साथ मुझे भी तारक दा ने लगा दिया उस विशाल शिलाखण्ड को गढ़ने के लिए जिसमें मुख्य अतिथि पद्मश्री राम वी. सुतार ने मूर्तिकला कार्यशाला का शुभारम्भ उसी विशाल शिला पर अपने कुशल शिल्पी अन्दाज में जिस सधे अन्दाज से आघात लगाए थे। मैने अपने कला पात्रों को रूपायित किया जिसमें आगे पीछे अनेक लोग जुड़ते गए कुल संख्या हो गयी सात, एक दूसरे को सहारा देते मानवीय सम्वेदनाओं को समेटे बिना सिर के सात लोग एक साथ आ गए।  यह सारे मूर्तिकार लगातार अपने कार्य मार्च,04,2013 तक पूरा करने का प्रयत्न तो किए लेकिन इसबार की शिलाओं का आकंर इतना विशाल था जो सामन्यतया किसी भी कैम्प में नहीं दिया जाता, परन्तु सभी ने अपने मनोयोग से अपने समस्त कार्यों को पूरा ही कर लिया था। 

चित्रकारों की कार्यशाला फरवरी,27, 2013 को श्री उदय प्रताप सिंह अध्यक्ष हिन्दी संस्थान उ.प्र. एवं प्रख्यात साहित्यकर्मी श्रीमती चित्रा मुद्गल जी के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता संतोष कुमार यादव, उपाध्यक्ष, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने की संरक्षकत्व का दायित्व एस.वी.एस. रंगाराव जिलाधिकारी गाजियाबाद ने निर्वहन किया, इस अवसर पर एस.वी राठौर एवं डी.पी.सिंह विशेष कार्याधिकारी गा.वि.प्रा. ने इस निहायत सादे समारोह में अतिथियों को उनके किट और पुष्पगुच्छ प्रदान किए कार्यक्रम का संचालन विनोद वर्मा ने किया।   अगर देखा जाय तो कलाएं हमारे समाज का प्रतिनिधित्व भी करती हैं, वे केवल एक सजावट की सामग्री नहीं हैं इनमें कलाकार की अपनी अभिव्यक्ति भी है।   इसबार जो चित्रकार इसमें शिरकत किए वे इस प्रकार हैं श्री आलोक भट्टाचार्य कोलकाता, श्री भंवर सिंह पंवार, अहमदाबाद, गुजरात. श्री प्रेम सिंह, नोएडा. श्री आर.के. यादव, नई दिल्ली, श्री राव साहब गुरवु, पुणे, महाराष्ट््र, श्री मुरली लाहुटी पुणे, महाराष्ट््र, श्री अशोक भौमिक, नई दिल्ली, डा. राम शब्द सिंह, सहारनपुर, श्री मनोज बालियान, नई दिल्ली, श्रीमती डा. लता वर्मा, गाजियाबाद, श्रीमती कविता बालियान, गाजियाबाद, श्री कुमार संतोश, गाजियाबाद, श्रीमती रेनू यादव, गाजियाबाद, डा. अल्का चडढ़ा, मेरठ, श्रीमती प्रियंका जैन, सोनीपत, हरियाणा, श्रीमती रजनी, फरीदाबाद, हरियाणा, डा.दल श्रृंगार प्रजापति, मोदी नगर, गाजियाबाद। अरविन्द कुमार, गाजियाबाद. श्रीमती सीमा भाटी, गाजियाबाद, श्रीमती प्रीति वर्मा, गाजियाबाद, यदु एवं पुरू गाजियाबाद से इनके अतिरिक्त अनेक वे लोग भी शरीक हुए जो कुछ करना चाहते थे।  अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में इस कैम्प के दरमियान सायंकालीन दैनिक कार्यक्रम चलता रहा जिनमें कवि सम्मेलन, मंचन, नृत्य एवं नृत्य नाटिकाएं भी आयोजित हुईं प्रमुख रूप से इसमें जो कवि शरीक हुए उनमें डा. लक्ष्मी शंकर बाजपेयी, निदेशक-आकाशवाणी, श्रीमती कीर्ति काले, विष्णु सक्सेना, पापुलर मेरठी, देवल अशीष, सुरेंद्र दुबे, विजेंन्द्र परवाज, नवाज देवबंदी, मासूम गाजियाबादी। गान्धर्व संगीत महाविद्यालय के कलाकार, वी.एम.एल.जी. कालेज गाजियाबाद की छात्राएं, एम.एम.एच. कालेज गाजियाबाद के छात्र छात्राएं, आजमगढ़ से पंडित नाट्य मंच। सारंगा, नई दिल्ली आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों एवं कलाकारों की वाह वाहियां बटोरी। ़ 
अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद-2013 के प्रायोजक आम्रपाली ग्रुप थे गा0 वि0 प्रा0 गाजियाबाद के तत्वाधान में इस कला उत्सव में निर्मित मूर्तियां एवं कलाकृतियां अपने तरह की एक अमूल्य निधि हैं।  
पूरा आयोजन दिनांक.04 मार्च 2013 को प्रो0 राम गोपाल यादव सांसद व नेता संसदीय दल लोकसभा समाजवादी पार्टी के द्वारा समापन की रस्म को पूरा किए सम्पूर्ण कला उत्सव में निर्मित मूर्तियां एवं कलाकृतियांे का अवलोकन कर प्रो0 यादव ने इनकी प्रासांगिता पर बल देते हुए राष्ट््र के कोने कोने से आए हुए कलाकारों का आभार ज्ञापित किए कि वह अपने कौशल से इस शहर के लिए बेशकिमती कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं यह शहर हमेशा इन्हें याद रखेगा। प्रो0 यादव ने उपाध्यक्ष, जिलाधिकारी, सचिव व समस्त गा0 वि0 प्रा0 गाजियाबाद के अधिकारियों की प्रशंसा करते हुए मुझे (लेखक) भी हिम्मत बधाई कि मैं अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद के संयोजकत्व का दायित्व पूराकर पा रहा हूं। इस अवसर पर कलाप्रेमी नगरवासी, छात्र छात्राएं एवं समस्त कलाकार शामिल हुए।  
कलाओं की ओर बढ़ते गाजियाबाद की कला संकल्पना का एक चरण और आगे बढ़ा जिसमें कलकारों की मांग पर उपाध्यक्ष गा0 वि0 प्रा0 गाजियाबाद से मशविरा कर मूर्तिकला पार्क के निर्माण की प्रो0 राम गोपाल यादव द्वारा घोषणा की गयी जिसका श्री अखिलेश यादव मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश ने गाजियाबाद आगमन पर संजय नगर में ‘मूर्तिकला पार्क’ का शिलान्यास भी किया ।
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(लेखकः प्रख्यात चित्रकार हैं,अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद के संयोजक हैं, एम.एम.एच.कालेज गाजियाबाद मे चित्रकला विभाग के अध्यक्ष)  
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पत्थर के कोल्हू में उत्कीर्णित लोक कला


डा.लाल रत्नाकर

पत्थर की खुदाई

                             इस प्रदेश में प्राचीन काल से उन्नत कला के रूप में पत्थर का काम होता चला आ रहा था, उदाहरण के लिए  सारनाथ (बनारस) में अन्य युगों के अतिरिक्त गुप्तकाल की मूर्तिकला का एक बहुत बड़ा केन्द्र था, और इस सारे क्षेत्र में विष्ेाशकर मिर्जापुर क्षेत्र में पूर्व मध्यकालीन कला का बड़ा क्षेत्र था। इस प्रकार यहां पत्थर की खुदाई-करने वाले कलाकार हुआ करते थे, परन्तु लोक कला में तुलनात्मक दृश्टि से पत्थर की खुदाई का काम कम हुआ। कुछ तो लोक देवताओं की मूर्तियों को फिर से प्रतिश्ठित कर दिया जाता है और नये सन्दर्भ में उनकी पूजा की जाती है। कहीं-कहीं सती के पत्थर मिलते है, जो मिर्जापुर तक में ही सीमित हैं और उनमें से तो कुछ दो तीन सौ वर्ष पुराने लगते हैं इन सब आकृतियों का हम यथास्थान उल्लेख करेेंगे। कुछ ऐसी व्यावहारिक वस्तुओं को भी देवता स्वरूप मान लिया गया है जैसे पत्थर के कोल्हू।1

                     यहाँ हम एक मुख्य रूप से विस्तार के साथ उसे लेगें जो गाँवों में सामान्य रूप से पाया जाता है, परन्तु अब इसकी उपयोगिता समाप्त हो गयी है। अतः पिछले 50, 60 वर्शो से या कुछ और अधिक समय से इनका निर्माण बन्द हो गया है। यह पत्थर की बड़ी-बड़ी षिलाओं के बने कोल्हू हैं जो किसी समय प्रत्येक गांव में रहे होंगे परन्तु अब कहीं-कहीं गांव के किनारे दिखलाई पड़ जाते हैं इनमें एक गोल भाग हेाता है जो प्रायः 70 या 80 सेण्टीमीटर ऊँचा होता है यही भाग अलंकृत होता है, हम इन अलंकारों का आगे विवरण देगें। इसके पूर्व हम इस कोल्हू का थोड़ा हाल दे देना आवष्यक समझते हैं। 
                                                         


                        यह कोल्हू गन्ने का रस निकालने के लिए बनाया जाता था। और पूरा का पूरा एक पत्थर का होता था जो कोई 2-1/2 या तीन मीटर ऊँचा होता था इसका निचला भाग भूमि में गाँठ दिया जाता था यह अंष सादा होता था जमीन से बाहर निकले हुए अंष में एक गरदन के समान होता है देखिए चित्रसंख्या (217)। इस गरदन पर एक लकड़ी का तख्ता बाँधकर बैल हाॅकने वाले का एक प्लेट फार्म की तरह बना दिया जाता था जो बैल के साथ-साथ घूमता रहता है। इसके ऊपर कोल्हू वाला मुख्य भाग होता है जो अलंकृत होता।2 

             इन कोल्हूओं का ठीक-ठीक अध्ययन नहीं हुआ है और ऐसी आशा की जाती है कि हमारे क्षेत्र में इसके सैकड़ों उदाहरण होंगे लेकिन लोगों की उदासीनता के कारण कितने नश्ट हो गये। दीवार में दब गये या जीमन में ही लुप्त हो गये फिर भी यहां कुछ उदाहरणों द्वारा जिनका जिक्र किया जा रहा है उससे दो बातें प्रकट होती है इनमें से पहली तो यह है कि अधिकाष कोल्हूओं में जो अलंकरण बने हैं वह किसी नियम या परम्परा में बंधे नहीं हैं अर्थात् मूर्तिकार परम्परा से प्राप्त अनेकानेक अलंकरणों में से किसी भी समूह का प्रयोग कर सकता था परन्तु इनके अंकन का विधान परम्परागत षैली में ही हुआ करना था। दूसरी ओर मैं बनारस जिले के कन्दवा क्षेत्र, जो काषी हिन्दू विष्वविद्यालय के उत्तर-पष्चिम के कोने पर पंचकोषी मार्ग पर है, में खोज के सम्बन्ध में धूमा। गाँव के बाहर एक प्रसिद्ध षिवालय है जिसमें कर्मदेष्वर  महादेव मूर्ति की प्रतिश्ठा हुई है। उसके सामने सुप्रसिद्ध बंगाली रानी भवानी का बनवाया हुआ एक बहुत बड़ा तालाब भी है। इसी के किनारे मुझे एक सुन्दर ढंग की खुदाईयुक्त कोल्हू मिला। दुर्भागयवष इसके दो ओर दीवारें खींच दी गयी है इससे इसका आधा भाग दीवार के अन्दर दब गया है इस क्षेत्र के आस-पास में अन्य भी कोल्हू देखने को मिले। यह सब बहुत कुछ एक ही प्रकार के हैं अर्थात् इनमें क्रमवार एक ही प्रकार की डिजाइन बनी है। इससे यह भी सम्भावना होती है कि इन कोल्हूओं की कोई स्थानीय परम्परा रही होगी जिसके अनुसार ये आकृतियाँ बनती थी। यदि प्रत्येक क्षेत्र में पर्याप्त उदाहरण मिल जाय तो तुलनातम्क अध्ययन से यह पता लगाया जा सकता है कि इस प्रकार की क्या-क्या परम्पराएं थी। परन्तु अधिक उदाहरणों के अभाव में इस प्रकार का कोई निश्कर्श निकालना ठीक नहीं होगा। 

             कोल्हूओं की यह परम्परा कम से कम 100 वर्षों (लगभग सौ वर्षों) से बन्द हैं अतएव यह कोल्हू 100 वर्ष या उससे अधिक पुराने होने चाहिए। परन्तु इनकी खुदाई का काम देखते हुए इनका समय निष्चत करना बहुत ही कठिन है, क्योंकि इनमें परम्परा चली आ रही है जो सैकड़ों वर्षों में भी कम ही बदलती है। हम आगे के उदाहरणों के आधार पर देखेंगे कि इनकी परम्परा थोड़ी बहुत भीत पर बनाए हुए चित्रों आदि से भी मेल खाती है। इस प्रकार हम इन्हें उसी सामान्य रूप से प्रचलित लोक षैली के अन्तर्गत मान सकते है। परन्तु एक दृष्टि से देखें तो कुछ अलंकरण तो इस प्रकार के है जिन्हें हम सीधे (सारनाथ संग्रहालय की) कुषाण कालीन मूर्तियों से जोड़ सकते हैं। इसलिए प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध विदुषि ‘स्टेला क्राइमरिष के शब्दों में, ‘‘इस  प्रकार का शिल्पकाल विहीन (टाइमलेस) हैं, फिर भी कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनसे वर्षों पुराने होंगे परन्तु इससे ज्यादा पुराने नहीं हो सकते। जैसे कुछ जगहों पर जो मेहरावें बनी है, जो उत्तर मुगलकला की जान पड़ती है‘‘।

              इन कोल्हुओं में अधिकांश अलंकरण विहीन या सादे हैं पर उनमें भी एक ओर सूर्य, चन्द्र वाला मोटिफ (अभिप्राय) अवश्य मिलता है। इस प्रकार यह निश्चित ही कोई माँगलिक चिन्ह था जिसका आवश्यक प्रयोग होता था। सामान्यतः सूर्य चन्द्र वाले अभिप्राय का अर्थ अनन्त काल होता है इसलिए हम यह अर्थ ले सकते है कि इस कोल्हू की अनन्त काल के लिए स्थापन हो गयी। भारतीय परम्परा और हिन्दू धर्म में किसी भी कार्य को छोटे-बड़ें का अभिप्राय आपदाओं से रहित और सूर्य चन्द्र के रहने तक की कामना के लिए यहाँ भी सूर्य-चन्द्र की आकृति बना दी जाती थी। यह एक परम्परा है जो अलंकृत कोल्हूओं के साथ-साथ चलती है।

यहाँ हम कुछ विशेष रूप से अलंकृत कोल्हुओं का वर्णन करेंगे। श्री दूधनाथ यादव ग्राम विसुनपुर, जनपद जौनपुर के यहाँ एक कोल्हू है। इसमें बहुत बारीकी के साथ चारों ओर खुदाई की गयी है।
जिसमें अनेक प्रकार की आकृतियाँ है। अन्य अलंकृत कोल्हुओं के समान इनमें भी ऊपर और नीचे फूलों की पट्टियाँ है और बीच में खड़ी पट्टियों के द्वारा स्थान को बांट कर दृश्य दिखलाये गए हैं। यहाँ प्रत्येक का अलग-अलग वर्णन है ..................................

अ - बटी हुई रस्सी का अलंकरण ............... यह अलंकरण ऊपर और नीचे के हासियों में दिया गया है, यह अलंकरण बहुत पुराना है जो अशोक के स्तम्भ शीर्षों के फलक पर मिलता है तब से ये बराबर भारतीय कला में चला आ रहा है।

आ- इसके नीचे एक फूलों की बेल है जो षायद कमल के फूलों की बेल है। इसमें फूल उल्टे लटके हुए हैं ये मुगल कला से प्रभावित हैं। इसमें थोड़ा नीचे एक सकरी पट्टी में त्रिभुज बने है नीचे की ओर एक सकरी पट्टी में मनके बने है। ये भी अशो काल में अशो के स्तम्भों से चले आ रहे हैं और उसके नीचे चौड़ी पट्टी में त्रिभुजाकार अलंकरण है। 



                          अब हम मुख्य दृश्यों को लेते है, एक ओर एक घोड़ें का रथ है, जो बहलीनुमा है इनमें घोड़ें की पीठ पर लगाम पकड़े हुए एक आदमी खड़ा है और घोड़े को हाक रहा है और इसमें सूक्ष्मता के साथ खुदाई हुई है। इस रथ पर एक चक्र है जिसे हम सहर्श सूर्य मान सकते है और चक्र के ऊपर चन्द्र है चारों और खिले हुए फूल बने है। और इन फूलों की परिकल्पना उसी प्रकार लगती है जैसे षुंगकाल की मूर्तियों में या मिट्टी के टिकरों में पायी जाती है। स्वय चक्र और उसके ऊपर चन्द्रमा भी षुंग या कुशाण काल के पत्थरों के फलकों से बहुत मिलते जुलते हैं यहाँ हम उदाहरण के लिए सारनाथ संग्रहालय से प्राप्त मथुरा में बनी भिक्षु बल की बनवाई हुई मूर्ति की दंत्र पर त्रिषुल की बनी हुई आकृति को लेते है। जो आमतौर से पहली षती ईष्वी की मानी जाती है क्योंकि यह कनिश्क प्रथम के तीसरे षासन वर्श में बनी। 

          यद्यपि इन दोनों उदाहरणों में सत्तरह अट्ठारह सौ वर्शो का अन्तर है फिर भी हमें इनमें अद्भुत साम्य दिखलाई पड़ता है। घोड़े चलाने वाले सईस की आकृति भी इस क्षेत्र में पाये गये भित्ति चित्रों में अंकित मानव चित्रों के बहुत नजदीक है, परन्तु उसको यहां बहुत सुव्यवस्थित और बारीक ढंग से बनाया गया है। हम ऊपर कह चुके है कि इन दृष्यों में खड़ें बल की पट्टियाँ जिनमें भी कुछ अलंकरण होता है। ऊपर वाले दृष्यों में दो आयताकार पैनलों को मिला दिया गया है और बीच की पट्टी को भी जान-बूझ कर खण्डित किया गया है। ऊपर के कोने का किसी फूल के चाँदे का चैथाई भाग दिखाया गया है, जो कमल का ही रूपान्तर हो सकता है। इस प्रकार का अंकन भी बहुत प्राचीन काल की खुदाईयों से मिलता-जुलता है। 
इस प्रकार हम यहाँ एक साथ कई विषेशताएं देखते है................. 

लोक कला के प्रचलित रूप। 

उनका बहुत परिश्कार किया हुआ रूप । 
परम्परा में रहते हुए भी उससे उन्मुक्त। 
अत्यन्त प्राचीन काल की भारतीय मूर्तियों से सन्निकटता, यद्यपि प्रायः सत्तरह अट्ठारह सौ वर्शो का व्यवधान पड़ चुका है। 
          दृष्यों को खाने मेें बाँटने की परम्परा भी पुरानी है, जो बराबर चलती रही। सारनाथ से गुप्त या गुप्तोत्तर काल के ऐसे षिला फलक मिले है, जिसमें बुद्ध का जीवन इसी प्रकार खानों में बाँट कर दिखलाया गया है और 1516 ई0 की वनपर्व की चित्रित प्रति में भी हमें ऐसे ही दृष्य मिलते हैं जिसमें बीच-बीच में खड़ी पट्टियों द्वारा दृष्यांें को अलग किया गया है। जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि प्रत्येक दृष्यों के बाद एक खड़ी पट्टी है। अन्य स्थनों पर भी इससे मिलते-जुलते अलंकरण प्राप्त होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सारे अलंकरण लोक कला की परम्परा में होते हुए भी बहुत बारीकी से खोदे गये हैं, इससे यह निश्कर्श निकलता है कि कारीगर में उच्चकोटि की रचना करने की क्षमता थी, और यह भी सम्भव है कि वह नागरिक उपयोग के लिए नगरीय कला में भी रचनाएं बनाता था। उदाहरण के लिए ये पूरी सम्भावना है कि यही संगतरास-जिसने इस कोल्हू की खुदाई की होगी उसी ने नगर के लिए दूसरे प्रकार के अलंकारिक पत्थर भी खोदें होगें अथवा किसी देवता की सुन्दर मूर्तिै गढ़ी होगी जो किसी मन्दिर में षोभायमान होगी, परन्तु इस अवसर पर कोल्हू के बाहरी भाग को उकेरने ;ब्।त्टप्छळद्ध में उसने केवल लोक-कला की किन्तु परम्परागत आकृतियाँ ही बनायी है, इस प्रकार इनका आकर्शण और भी बढ़ जाता है। अब हम यहाँ कुछ फलकों ;थ्स्।ज् ैन्त्थ्।ब्म्द्ध को सारंाष में लेते हैः-
अ- कुष्ती का दृष्य: 
इसमें दो पहलवान गुथे हुए है। इनकी आकृति ठेठ लोक-कला षैली की है जैसा कि हम ऊपर भित्ति चित्रों में भी देख चुके हैं अर्थात् इनका धड़ त्रिभुजाकार है, गर्दन पतली ओर लम्बी, सिर अण्डाकार है। परन्तु यहाँ उनकी टाँगें बड़ी लचीली अर्थात् डाल की तरह है, जिनका मध्य भाग बिल्कुल गोलाकार सा रखा है। इस दृश्य में अद्भुत गति है, पहलवानों का षरीर बहुत ही लचीला दिखलाया गया है और दृष्य में एक विषेश प्रकार का रिद्म है। इस दृष्य के दोनों ओर छोटे-छोटे त्रिकोणों की गोट है जैसा कि हम भित्ति चित्रों में देख चुके हैं। 

आ- एक अन्य पैनल में एक रथ चला जा रहा है जिसमें घोड़ा जुता हुआ मालूम पड़ता है परन्तु उसका षरीर बहुत भारी बनाया गया है और चेहरा भी चिड़िया के समान दिखलाया गया है। यद्यपि ये पषु यर्थाथ से थोड़ा भिन्न है परन्तु नगर खींचने के प्रयास में इसके पैर बड़ें स्वाभाविक ढंग से मुड़े है और इसके पेट पर लटकाता हुआ माँस भी बडे़ स्वाभाविक ढंग से दिखलाया गया है, इसके सामने लगाम पकड़े एक नाटा सा व्यक्ति है, जो इसका सईस हो सकता है। पीछे बड़ा सारथ है जिस पर कुछ बड़ें लोग खड़ें हैं इस फलक को देखने से यह स्पश्ट है कि इन अंकनों में परम्परा और यर्थात् का एक अद्भुत प्रकार का मिश्रण हुआ है। इस प्रकार के हल्के-हल्के संकेतों से दृष्यों में आकर्शण बढ़ गया है और इससे षिल्पकार के कृत्तिव का परिचय भी मिलता है। इ- एक अन्य फलक में दो व्यक्ति हाथ में संगीनयुक्त बन्दूक लिए आगे चले जा रहे है। इसमें अपेक्षाकृत यथार्थ का अधिक प्रयोग हुआ है। आषा की जाती है कि मूर्तिकार ने सामरिक जीवन की छाप इस पर डाली है इस प्रकार परम्परा से हटकर जो आकृतियाँ मिलती हैं उनसे भी आकर्शण बढ़ता है। 
ई- इसके बाद हम अगले, फलक में अत्यन्त सुन्दर मोर पाते है। इसकी पूँछ चीनी पंखे के समान फैली हुई है और हम इसे उत्तर मुगलकाल के एकेन्थस प्रकार के पत्ते से जोड़ सकते हैं इसमें रेखाएं बहुत प्रवाहपूर्ण हैं। 
उ-   इसके अतिरिक्त एक फलक पर हाथी और उसका सवार है यहाँ हाथी का धड़ सूँड़, पूँछ आदि अंग बहुत स्वाभाविक ढंग से बनाये गये हैं।  पैर मुडे़ हुए हैं जो घोड़ें के पैर के मिलान से ज्यादा निकट है इस प्रकार विलक्षणता उत्पन्न की गयी है, जो आकर्शण है हाथी की पीठ पर एक व्यक्ति बैठा है, जो एक लम्बे झण्डेनुमा अंकुष से उसे चला रहा है। उक्त प्रकार का अर्थात् लम्बा डण्डानुमा अंकुष का प्रयोग हम एक भित्ति चित्र में भी देख चुके है।
उपर्युक्त वर्णन से हम इस निश्कर्श पर आते हैं कि कुछ ऐसी लोक कलाएं भी थी जिनका आधार (बेस) अवष्य परम्परागत था किन्तु उसमें कलाकार की मौलिक कल्पना का योग था। वस्तुतः ऐसी कल्पनाओं के प्रयोग द्वारा कलाकार उस परम्परा में नवीनता उत्पन्न करता था। लोक षैली का कलाकार होते हुए भी वह साधारण कोटि का काम नहीं करता था बल्कि उसमें सुक्ष्मता एवं अलंकारिता को महत्वपूर्ण स्थान देता था, इससे यह अनुमान होता है कि लोक जीवन में इन विषेशताओं की पहचान रही होगी और लोग अच्छे कलाकारों की क्रद करते रहे होंगे। किन्तु लोक-कला की परम्पराएं इतनी मजबूत थीं कि उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं लाया जा सकता था, परन्तु ऐसा न था कि कलाकार या सामग्री बनाने वाली व्यक्ति अपने को परम्परा के बन्धन में बँधा हुआ मानता हो, क्योंकि यदि यह परम्परा बन्धन स्वरूप होती तो उसमें इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति नहीं हो सकती थी। वस्तुतः यह परम्परा उनको एक नयी प्रेरणा देती थी और उस प्रेरणा से प्रेरित होकर वे कलाकृतियों का निर्माण करते थे। हमने ऊपर बन्दूकधारी दो सिपाहियों की चर्चा की हैं। इस प्रकार के दृष्य तत्कालीन समाज से लिये गये हैं। कलाकार इन्हें अपनी कला में स्थान देकर परम्परा में एक नयी खिड़की खोल देता है जिससे परम्परा में ताजगी आ जाती है, परन्तु तारीफ है कि इनका अंकन भी ऐसे ढंग से होता है कि यह भी उसी परम्परा के एक अंग बनकर उपस्थित होते हैं। यदि हम तुलना की दृश्टि से देखें तो बहुत से ऐसे क्षेत्र मिलेंगे जिनमें परम्परागत दृष्यों के साथ-साथ तत्कालीन समाज की भी कुछ झलक पड़ जाती है, इनका बहुत अच्छा उदाहरण बंगाल की बालूचर साड़ियों या कालीघाट पर (चित्र) या बंगाल के मन्दिरों में बने हुए टेराकोटा में मिलता है। इनमें भी योेरोपियन लोग बार-बार दिखालाए गये है। इसलिए विषुनपुर जिला जौनपुर के इस कारीगर को भी उसी श्रेणी में रखते हैं जिसने अपने समाज की भी एक छाया इस पैनल (फलक) मेें की है। 
आजमगढ़ जिले के खानजहाँपुर ग्राम में एक कोल्हू मिला। अनेक विषेशताओं में ऊपर के विषुनपुर जौनपुर ग्राम के कोल्हू से मिलता-जुलता हैं। अपेक्षाकृत इसकी खुदाई कम बारीक है, तथापि इसके फलकों में बहुत जानदार आकृतियाँ है। यहाँ भी एक बहुत उच्च्कोटि का मोर बना है।  दूसरे पैनल में हनुमान जी की बड़ी विलक्षण आकृति है। इन पैनलों के बीच में एक चटाईदार खड़ी पट्टी और एक कमल की पंखुड़ियों की पट्ट भी बनी है। 
                       आजमगढ़ जिले के खानजहाँपुर ग्राम का एक कोल्हू
 हनुमान जी की आकृति की मूर्ति एक मेहराबदार स्थान के नीचे बनी है इसमें वे बड़ी निर्भय व ओजपूर्ण मुद्रा में आगे चलते हुए दिखलाए गये हैं उनके दोनों पैरों के बीच कोई राक्षस गिरा पड़ा है जिसे रौंदते हुए चले जा रहे है। ऊपर उठे हुए दोनों हाथ या पैरों के जोड़ कोणात्मक ढंग से दिखलाए गये है। जिससे आकर्शण बढ़ जाता है इसी प्रकार से पूँछ दाहिनी ओर बगल में उठकर घूमी है जो कि उनके सिर तक पहुँच जाती है न जी का वक्षस्थल बहुत चैड़ा है और कुछ माँसपेषियाँ उभरी हुई दिखलाई गई है बदन पर जनेऊ है, चेहरा छोटा है, मुँह खुला है, सिर पर एक त्रिभुजाकार टोपी जैसी चीज दिखलाई पड़ती है। उठे हुए हाथों  में कुछ आयुध है जो ठीक से प्रकट नहीं होते।
यहाँ पर ग्राम विषुनपुर जनपद जौनपुर के एक कोल्हू के दो फलकों का उल्लेख और दिया जा रहा है। एक में तो हाथी पर सवार दो व्यक्ति है। इनमें एक तो हाथी का मालिक है जो बैठा हुआ हुक्का पी रहा है। इसके दाहिने हाथ में लम्बी सी वस्तु है जो भाला या छड़ी हो सकती है। इसके अगे महावत है जो अंकुष से हाथी चला रहा है।ऊपर जैसा हम पहलवानों को फलक में देख चुके है। यहाँ भी उन व्यक्तियों की आकृति उसी प्रकार की है अर्थात् धड़ त्रिभुजाकार और मध्य भाग एक गोल लट्टू की तरह से है जिसमें से दो पतले सींक के सामान पैर निकले है। यही षारीरिक विधान हम अगले पैनल में देखे थे। (प्रस्तुत पैनल में हाथी की आकृति में हाथी का आकार परम्परा के अनुसार है अर्थात् उसका मस्तक भी प्रायः बिल्कुल गोल सूँड पतली पर सीधी, लम्बी है। पैर मिटटी के खिलौनों की तरह है पैर दोनों ही एक साथ आगे की ओर बढ़े है। मिट्टी के खिलौने में भी

दोनों पैर एक साथ आगे की ओर बढ़े रहते है। यहाँ यह बात लक्ष्य करने की है कि मिट्टी के खिलौनों के दोनों पैर एक साथ आगे बढ़े हुए हैं ये इसलिये भी दिखलाए जाते हैं कि आकृतियाँ अच्छे ढंग से खड़ी रह सके अर्थात् बैलेंस बना रहे। यह परम्परा बहुत पुरानी है। हमलोंगों को ईषा पूर्व के मिट्टी के खिलौनों में भी यही परम्परा मिलता है। यहाँ ऐसे अंकन की कोई आवष्यकता नही थी क्येांकि यह आकृति तो हल्की उभारदार है और पत्थर की सतह पर ही खोदी गयी है परन्तु संग तरास ने परम्परा के अन्तर्गत उसी षैली की आकृति बना दी। 
इसके बाद एक और पैनल मिलता है इसमें तीन व्यक्ति बने है पर इसकी ठीक-ठीक पहचान नहीं हो सकती। अतः तीनों आकृतियाँ जैसे चलती हुई दिखाई गई है परन्तु इसके लिए प्रत्येक के दोनों पैर फैले हुए हैं जो त्रिभुजाकार है मध्य भाग में गोलाकार और धड़ पुनः त्रिभुजाकार है। इसमें किनारे के दोनों व्यक्ति मानों सिर करके (एलांगेटेड- दिखलाई गई है, यह जानवरों के लम्बे-लम्बे पैरों से प्रकट होता है। इसमें हाथी (हथिनी) की आकृति है, जो कोहबर में बने हाथियों के दीवार पर चित्र के बिल्कुल नजदीक है अर्थात् यहाँ भी खम्भे के समान सीधे लम्बे-लम्बे पैर है और षरीर करीब-करीब चैकोर है। ऊपर बक्सानुमा एक आलमारी है जिसमें हाथी सवार और आगे एक महावत बड़े अकड़ के साथ बैठा है । हाथी के सामने एक अलंकारिक वृक्ष है जो नरकट के स्थान सीधा ऊपर को चला गया है हाथी की गति उसके आगे-पीछे के दो पैरों के जरा मुड़ने से दिखलाई गई है। इसके बगल में घुड़सवार है, जो महावत की भांति बैठा है। इसमें कलाकार छोटे-छोटे विवरणों पर भी ध्यान देता है जिसका उदाहरण यहाँ घोड़े के उठी हुई पूँछ से दिखलाई पड़ता है। इसके बाद वाले फलक में एक हिरन है जिसका षरीर बड़ा गोल-मटोल बना दिया गया है। एक अन्य फलक में एक आदमी खड़ा है, जिसका सिर, गला, धड़, कोहबर में चित्रित आदमी से मिलता-जुलता है। अगले फलक में सवारी में बैठा एक व्यक्ति जा रहा है, इन दोनों के बीच में उसी प्रकार का सीधा आलंकारिक वृक्ष है, जैसा ऊपर कह चुके हैं। 

 ओदार वाराणसी से प्राप्त एक कोल्हू के दृष्यों में विविधता है। इसमें सभी दृष्य कमानीदार पर लहरियादार ताखों में बने है। एक दृष्य में हाथी सवार (पषु वस्तुतः हथिनी है और उसका बच्चा भी) नीचे दिखलाया गया है। हाथी का मालिक मस्ती से पैर फैलाए बैठा है जिसके एक हाथ में हुक्का और दूसरे में सम्भवतः फूल का गुच्छा है। सभी पुरूश आकृतियों का ऊपरी भाग तिकोना, निचला भाग अण्डाकार और आँखे गोल-गोल है ़़़दूसरे दृष्य में दस पहियों की एक बड़ी गाड़ी है जिसमें कई कक्ष है मुख्य कक्ष में दो पुरूश कुर्सीनुमा किसी सीट पर बैठे हुक्का पी रहे है। बीच वाले कक्ष में दो स्त्रियाँ बैठी है अर्थात् यह जनाना कक्ष है। सामने वाले कक्ष में गड़ी का चालक है जिसमें एक आदमी बड़ी मुस्तैदी से कोईहैण्डिलनुमा चीज़ घुमा रहा है उसके अनुसार आगे की पहिया
घुमी हुई है और यह घुमाव पिछले पहिये में भी दिखलाई पड़ता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोल्हू के गोलाई लिए 

हुएसतह पर इस घूमती हुई गाड़ी को बड़ी सुन्दरता से आरोपित किया गया है। इससे कलाकार की प्रयोगात्मक प्रवृत्ति का पता चलता है। सम्भव है कलाकार के मन में रेलगाड़ी चित्रित करने की भावना रही हो, क्येांकि इस गाड़ी में कोई पषु जुता हुआ नहीं दिखलाई पड़ता है और आगे की ओर इंजन की चिमनी भी प्रतीत होता है। इस प्रकार लोक कलाकार अपने समसामयिक जीवन से भी सम्बद्ध था और उसके मन पर तत्कालीन घटनाओं की छाप पड़ती रहती थी, यह उसके व्यापक दृश्टिकोण का एक प्रमाण है। परन्तु साथ-साथ वह अपने अनुभवों को बडी आसानी से अपनी पारम्परिक कला में ढाल देता था यहां सपाट सतह (फ्लैट सरफेस) और रेखाओं द्वारा दोनों का समन्वय किया गया है। 

               हमने ऊपर देखा है कि हनुमान जी की आकृतियाँ भी कोल्हू में उत्कीर्ण की जाती थी, या एक प्रिय विशय था और इसका जनमानस से बहुत निकट का सम्बन्ध था। हनुमान जी भी आकृतियाँ सामान्य रूप से तेरहवीं-चैदहवीं षती से मिलने लगती है और गाँव-गाँव में इनकी मूर्तियों की प्रतिश्ठा हुई है। श्री रामदरबार के सदस्य होते हुए भी मानों वे एक स्वतन्त्र देवता है। विषेश रूप से जब उत्तर भारत मुसलमानी राजतन्त्र से आक्रान्त था तब हिन्दू समाज को एक ऐसे देवता की आवष्यकता थी जो इनके रक्षक के रूप में प्रस्तुत हो और उनमें प्रेरणा को उद्दीप्त करें। गाँवों के पाष्र्व में हनुमान जी को मूर्तियाँ स्थापित है उन्हें हम ठीक-ठीक लोक षैली की आकृतियाँ नहीं कह सकते, सामान्य रूप से उन्हें मार्गीय कलाकारों ने बनाया है और वे षास्त्रीय कला के उदाहरण हैं कहीं-कहीं ऐसी मूर्तियों में लोक कला का कुछ थोड़ा सा प्रभाव दिखलाई पड़ता है। 

               हनुमान जी की इन मूर्तियों की तुलना प्राचीन काल की महावाराछ की मूर्तियों या कुछ हद तक वामनाकार त्रिविक्रम आकृतियों से की जा सकती है, क्योंकि इन सभी मूर्तियों में उनका एक ओजपूर्ण रूप दिखलाई पड़ता है, परन्तु गाँवों या नगरों में हनुमान जी की जो मूर्तियां मिलती है उनका स्वरूप मूर्तिषास्त्र के अनुसार बहुत कुछ निष्चित हो गया था। सामान्यतः ये खड़ी हुई मुर्तियाँ होती है। हनुमान के हाथ में गदा होता है और कभी-कभी वे स्वयं किसी राक्षस के षव पर खड़े दिखालाए जाते हैं यही रूप इन कोल्हूओं पर भी अंकित है। किन्हीं-किन्हीं मूर्तियों में उनके कन्धे पर राम और लक्ष्मण भी विराजमान है। ऐसा एक उदाहरण जौनपुर जिले के सिरौली ग्राम के एक कोल्हू में है। यहाँ हनुमानजी के सिर पर तीन षिखरों वाला पत्राकार एक मुकुट है और सम्भवतः अपने षरीर पर जिरह बख्तर प्रकार की काई चीज पहने हो इसका आकार भी विलक्षण है और इसके कोने दोनों ओर लटक रहे हैं। सम्भवतः उनके पैरों में पायजामा भी है। इस प्रकार वह एक मध्यकालीन योद्धा के रूप में दिखालाए गए हैं। उनके दाहिने हाथ में एक लम्बे डण्डे वाला गदा है इसका भी आकार विलक्षण है, क्योंकि गदा के गोले को षरीफे की आकृति के समान बनाया गया है और उसका दण्ड ताड़ के तने के समान है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस परम्परा में ऐसी भावना रही होगी कि ताड़ का पेड़ उखाड़ कर प्रहार करने वाले हैं परन्तु उसे गदा का रूप दे दिया गया है, 25 इसकी दूसरी पहचान भी हो सकती है हमें ईस्वी सदी के प्रारम्भ में पष्चिमोत्तर भारत से (जो अब पाकिस्तान का है पष्चिम पंजाब और पष्चिमोत्तर सीमा प्रान्त है) षिव या विश्णु की ऐसी मूर्तियाँ मिलती हैं, जो हाथ में इसी प्रकार का गदा लिए हैं। अर्थात उनका गदा का दण्ड गाँठदार है कोई आष्चर्य नहीं कि यह परम्परा लोक कला में इतनी दूर के क्षेत्र तक और इतने बाद तक चली आयी। हम यथास्थान देखेंगे कि लोक कला में अत्यन्त प्राचीन परम्पराएं भी चलती रही। हनुमान जी के दूसरे हाथ में पंखे के समान एक आमुध है। यहाँ उसका रूप थोड़ा लम्बोत्तरा हो गया है। इसके भीतर दाने-दाने बने है। आजमगढ़ के खानजहाँपुर नामक ग्राम से प्राप्त एक अन्य कोल्हू में जिसकी हम आगे चर्चा करेंगे। यह आयुध बड़ें रूप में दिखाया गया है। हमें इस प्रकार के मुगदर राजस्थानी षैली के चित्रों में जो सत्रहवीं षती के हैं, बराबर मिलतें है। विषेश रूप से मालवा षैली के देषाख राग के चित्रों में ऐसे मुगदर दिखलाई पड़ते हैं। यहाँ उनका प्रयोग एक आयुध के रूप में हुआ है। 

                              हम ऊपर कह चुके हैं कि हनुमान जी के कन्धों पर राम और लक्ष्मण विराजमान है। इनकी आकृति सामान्य लोक-कला के रूप में है और उनके पैर का अंष सहसा लुप्त हो जाता है। कमर से उनका षरीर इस प्रकार घूमा हुआ है मानों वे कन्धे पर बैठे है। इन अंकनों में संजीवता है। हनुमान जी अहिरावण राक्षस के षरीर को कुचल से है राक्षस मरते-मरते छटपटाहट के साथ हनुमान जी पर तलवार से प्रहार करना चाहता है एक ओर हनुमान जी की ओजपूर्ण मुद्रा पर तलवार से प्रहार करना चाहता है एक ओर अनुमान जी की ओजपूर्ण मुद्रा और दूसरी ओर राक्षस का निश्फल प्रयत्न दोनों को ही लोक कलाकार ने बड़े मार्मिक ढंग से दिखलाएं है। इन आकृतियों की तुलना हम कुछ सीमा तक प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय महिशमर्दिनी दुर्गा की मूर्तियों में महिशासुर के अन्त के दृष्य से कर सकते हैं, परन्तु लोक कलाकार ने इस दृष्य में जान डाल दी है। यहाँ मृत्यु की पीड़ा में राक्षस ने अपना पैर ऊपर उठा दिया है इसका षरीर एंेठा जा रहा है तथापि वह हाथ उठाकर तलवार चलाने का भी निश्फल प्रयास कर रहा है। इस अंकन में सबसे चमत्कारिक रूप से हनुमान जी की पूँछ दिखायी गयी है जिसमें थोड़ा सा घुमाव है और सारे दृष्य में थोड़ा सा हास्य का भी पुट है। यही हम तुलना के लिए ग्राम हसरौली जौनपुर से प्राप्त एक कोल्हू पर प्राप्त हनुमान जी की आकृति ले सकते है। यद्यपि पूर्व आकृति की तुलना मे यहाँ विविधता जी की आकृति ले सकते है। यद्यपि पूर्व आकृति की तुलना में यहाँ विविधता कम ओर हनुमान जी की गति भी थोड़ी नियन्त्रित है। परन्तु पूरे दृष्य को देखते हुए उसमें ओज की मात्रा बहुत दिखलाई पड़ती है। उनकी मुखाकृति में वानरी रूप अधिक स्पश्ट है। उनका षरीर, धड, पैर मनुश्य आकृति के समान है । उनके हाथ में मूसल के समान परन्तु तीर जैसे नुकीले छोर वाला एक मुगदर है। बायें चर्चा की जा चुकी है। इसमें दानेदार अलंकरण का खूब प्रयोग हुआ है जैसे हनुमान जी के करण्ड मुकुट (टोकरी की तरह ) उनके गले में हार, उनका जांघिया घण्टाकृत गदा एवं अहिरावण के वस्त्रादि में प्रयोग मिलता है। 

                          यहाँ उपर्युक्त कई उदाहरणों में हनुमान जी के अंकन में एक ओर तो साम्य है तो दूसरी ओर स्थानीय परिवर्तन भी हुआ है। इनसे यह प्रकट होता है कि लोक कला में तक्षण (कार्विग) की अनेक परम्पराएं थी जो एक साथ ही आस पास के क्षेत्रों में पाये जाने वाले उदाहरणें मेे मिलती हैं। इनमे कुछ साम्यता और कुछ विभिन्नता भी है। अब यह सारी परम्पराओं में क्या-क्या विभिन्नताएं थी, यह खेाज का विशय है। दूसरी ओर यह आष्यर्च का विशय है कि इनमें मध्यकालीन कला की अनेक परम्पराएं चली आ रही थी। उनके उदाहरण स्थान-स्थान पर मिलते हैं हम ऊपर देख चुके है कि दोनों के द्वारा अलंकरण आदि सूचित किये गए हैं यह परम्परा नवीं, दषवी षती की मूर्तियों तक में मिलती हैं और उनका भरपूर प्रयोग अपभ्रंष (जैनषैली) के चित्रों मे भी मिला है। बनारस नगर के निकट पंचक्रोषी सड़क पर प्रायः 100 वर्श पुराना एक कोल्हू पड़ा है। हाल ही के वर्शो में इसका एक अंष दीवार में दब गया है फिर भी जो अंष सामने दिखलाई पड़ता है वह कला की दृश्टि से बहुत ही  महत्वपूर्ण है,  इसमें ऊपर ओर नीचे एकेन्थस की पत्तियों के समान व कमल के समान झालर है, बीच में प्रत्येक आकृति एक आर्य या कमानी  के अन्तर्गत दिखायी गयी है। कहीं-कहीं पर एक चैड़ी पट्टी में कमल की पंखुड़ियों को बनाकर दो आकृतियों को भी अलग किया हैं प्रत्येक मानी के नीचे एक पषु या पक्षी की आकृति बनी है एक अन्य के नीचे सूर्य चन्द्र भी बने हैं पर उसका आधा अंष दीवार से ढक गया है। पषु-पक्षियों में बाघ, सिंह, हाथी, मोर आदि बनाए गए है। जिनमें एक महावत है जो अंकुष से हाथी चला रहा है तथा मालिक हुक्का पी रहा है जिसको उसका नौकर पकड़ें हुए तथा सामने वल्लम लिए हुए एक पहरेदार भी खड़ा है। ये मानवाकृतियों बहुत महत्वपूर्ण है। इनके सिर या चेहरें वर्फीनुमा बनाए गए हैं जिनमें बड़ी-बडी़ आँखे, तथा षरीर पर के वस्त्र घुमी हुई-रेखाओं के द्वारा दिखलाए गए हैं इसी प्रकार की गोल और लहरियादार रेखाएं हाथी के षरीर और सिर पर मिलती है जो हाथी के सिर पर रखा हुआ कोई सजावटी कपड़ा है ये सभी रेखाएं कथरी की तरह का आभास देती है। सभी पषु-पक्षियों में बहुत जीवन्त अभिव्यक्ति      

 षेर, बाघ आदि गुर्राते हुए जैसे मालूम पड़ते हैं।  षेर के षरीर पर भी नाख्ूानी रेखाएं हैं जिससे उसका स्वरूप लकड़बघे की तरह प्रतीत हेाता है। बाघ के अयाल पत्तियों की तरह बनाए गए हैं तथा पूँछ जैसे मोटी डोरियोकं का समूह हो। यह पूंछ बड़ें जोरदार ढंग से ऊपर उठ कर घूमी हुई है। अन्त में हम मोर को लेते है,ं इसकी चाल बड़े सहज ढंग से दिखलाई गयी है और इसकी पूंछ और पंख पत्तियों की तरह के अलंकरण है। सारांष यह है कि इस कोल्हू की आकृतियों में एक विलक्षण प्रकार की आलंकारिता है, जो बढ़ा चढ़ा कर दिखलाई गई है। इससे एक नये प्रकार की सृजनात्मकता प्रतीत होती है यद्यपि यह सभी आकृतियाँ परम्परा से प्राप्त थीं परन्तु सन्तराम ने इन्हें इतने स्वाभाविक ढंग से काटा है कि उनमें परम्परा का बोध न होकर बल्कि ताजगी बनी हुई है। प्रत्येक आकृति में भिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियाँ है। जिससे समरसता (मोनाटनी) नहीं दिखलाई पड़ती बल्कि सृजनात्मकता प्रकट होती है। यह आकृतियाँ निष्चय ही लोक कला भी है परन्तु इनमें किसी प्रकार से कारीगरी की कमीं नहीं दिखलाई पड़ती। पत्थर की कटाई प्रविधि (टेकनीक) उन्नत और सम्पूर्ण कार्य इतनी सफाई से किया गया है उक्त दृश्टि से यह आकृतियाँ उन्कृश्ट मूर्तियों को टक्कर ले सकती है। इससे निश्कर्श निलकता है कि कलाकार इन आकृतियों को पूरे मनोयोग से बनाता था, उसके मन में किसी प्रकार का संषय (हेजीटेषन) नहीं था बल्कि परम्परा में पूरी तरह से डूबा हुआ था और उसका एक तरह से अंग बन गया था। यह एक ऐसे कलाकार की कृति नहीं है, जो आकृति को बिना सोचे समझे बना रहा हो या किसी प्रकार की षीघ्रता में हो बल्कि कलाकार ने पूरे मनोयोग के साथ और अपनी हेकनीक का पूरी तरह सही-सही इस्तेमाल करने के बाद इन आकृतियाँ को बनाया। कलाकार को यह आत्मविष्वास था कि उसकी ये आकृतियाँ षाष्वत रहेंगी जैसा कि उसने सूर्य चन्द्र के प्रतीकों के द्वारा संकेत दिया है। यहाँ हमने कन्दवा के कोल्हू को लेकर जो उपयुक्त निश्कर्श निकाले हैं वस्तुतः वह इस क्षेत्र के सभी लोक-कला पर लागू होते है, एवं अन्तर्हित दृश्टिकोणो के प्रमाणार्थ यह एक अच्छा उदाहरण है। 

हसरौली जौनपुर के कोल्हू की चर्चा ऊपर हो चुकी है, परन्तु यह स्वयं में बहुत ही विलक्षण उदाहरण है अतएव उसका यहाँ पर विस्तार से उल्लेख करना आवष्यक है। इसमें भी ऊपर नीचे जोंकिया पट्टियाँ है और ऊपर एक सुन्दर झालर है जिसमें कमल के अधखिले फूली और पान की तहर पत्तियाँ हैं, बीच के भाग में छोटे-बड़ें चैकोर स्थान दिखलाए गए हैं, जिनमें बीच-बीच में सादे खड़े डण्डे है। प्रमुख दृष्य में घोड़े की वहली पर दो आदमी सीटों पर बैठे है और बीच में एक आदमी खड़ा है। सम्भवतः यह खड़ा हुआ आदमी नर्तक है और नृत्य दिखलाता हुआ चल रहा है। गले में कुछ आभूशण है और यह नर्तकों की काछनी जैसा वस्त्र भी पहने है। आगे लगाम पकड़ें कोचवान है और साथ में एक साईस भी है। इसके सतह काफी सपाट है, परन्तु बीच-बीच में गैरवक अलंकरण भी दिखलाए गए है, दृष्य में प्रवाह है और आकृतियाँ क्रमषः ऊपर नीचे एक हल्की लहर के समान दिखलाई गई है दाहिनी ओर ऊपर कोने में खाली स्थान पर एक छोटी सी पषु आकृति दिखलाकर कुछ गहरी पृश्ठभूमि का आभास करा दिया गया है। इसके बाद वाले फलक में भी एक गतिषील दृष्य हैं। यहाँ दो षिकारी, जिनके चेहरे बिल्कुल गोल है और एक चष्मी और गोल आँखें बिल्कुल बीचो बीच दिखाई गयी है। सम्भवतः ये अंग्रेज है और इनके सिर पर टोप जैसी कोई चीज है। उनके हाथ में संगीनदार बन्दूक है जिन्हें वह इस प्रकार उठाए है मानों सितार बजा रहे हो, इससे एक हल्का हास्य उत्पन्न होता है। सम्भवतः लम्बे तडंगे अंगेजो को, व्यक्त करने के लिए कलाकार ने इनकी आकृतियाँ बहुत लम्बी बनायी है। यहाँ भी कोने में एक छोटी सी मानव आकृति है यह अंष घिस गया है जिससे कम स्पश्ट है। 

                           ऊपर पुनः सूअर के समान दो जानवर दिखलाए गए हैं इनकी छोटी आकृति से संकेत होता है कि ये दूर की पृश्ठभूमि में है। इनकी पूँछ बढ़ाकर षेर की तरह कर दी गयी है और इनके बदन के रोओं को इस प्रकार दिखलाया गया है मानो कि चार खाने की झूल पड़ी हुई है, इसी प्रकार के चारखाने की एक पट्टी पिछले फलक में घोड़े की पीठ और अयाल पर भी दिखलाई गई थी। एक अन्य फलक में एक अत्यन्त आलंकारिक वृक्ष बना है, जो एक लहरियादार कमानी (मार्च) के अन्तर्गत है, इसमें सीधे उथरता हुआ एक वृक्ष है जिसकी समानान्तर रूप से लटकती हुई पत्तियाँ है। स्थान-स्थान पर सुग्गे बने हैं मानों वे उसका फल खा रहे हैं, इन सुग्गों के पंख भी चारखानों से अलंकृत है, इसके अतिरिक्त हाथी का भी एक फलक है। 

                           श्री रामकुमार सिकन्दरा, जौनपुर के यहाँ भी एक सुन्दर कोल्हू देखने को मिला। इसकी झालर में टयूलिब के समान पत्ती वाले फूल उल्टे क्रम से बने हैं इसके अतिरिक्त पाष्र्व में कमल की पत्तियाँ या नीचे एंेठी हुई रस्सी का अलंकरण भी दर्षनीय है। इसके पैनल बड़े आकर्शक है। एक में दो सूर्य चन्द्र बड़े आलंकारिक रूप में चित्रित है। इसके बाद के फलक में चिरपरिचत हनुमान जी का दृष्य है। उनके फैले हाथ कन्थे पर बैठे राम-लक्ष्मण एवं उनकी गति कुल मिलकार ओजपूर्ण मुद्रा में चित्रित है। स्वयं हनुमान के सिर पर सितारेनुमा एक मुकुट वक्षस्थल पर लम्बे-लम्बे हार जैसा अलंकरण भी है। एक ओर उनकी पूँछ  सषक्त रूप से ऊपर उठी है तो दूसरी ओर उनकी धोती का छोर पीछे की ओर तेजी से उड़ता चला जा रहा है, इस प्रकार इस फलक में हनुमान जी के षौर्य और गति को बहुत अच्छे ढंग से दिखलाया गया है। स्वयं हनुमान जी एक राक्षस को पैर से कुचल रहे हैं। जमीन पर गिरा राक्षस अपना सिर उठाए है और एक हाथ से छोटी सी तलवार भी उठाने का प्रयत्न कर रहा है। हनुमान ही का विषेश रूप से आगे उठा हुआ पैर राक्षस  को कुचलने को उघत है। यह सभी आकृतिया थोड़ी-थोड़ी लम्बोत्तरी है। उनमें एक विषेश प्रकार का लचीलापन आ जाता है। एक अन्य फलक में त्रिभंगी श्रीकृश्ण जी वंषी बजा रहें है, इनके आभूशण और मुकुट हनुमान जी के ही सरीखे है। कृश्ण जी के दोनों ओर गोपियाँ है, उनके सिर पर     या तो मुकुट या गगरी है। ये गोपियाँ सम्भवतः श्री कृश्ण जी पर चंवर डुला रही है। जो पंखे के आकार का है, यहाँ श्रृंगार रस प्रधान है। अतः इसमें हनुमान जी की आकृति (वीर रस) के समान वह तीव्र गति नहीं है, पर आकृतियाँ उसी प्रकार लम्बी है। इसी श्रृंगारी भाव को दर्षित करने के लिए कलाकार ने कृश्ण के बाएं हाथ को बायें ओर वाली गोपी के वक्षस्थल पर रखा है। इसके बाद वाले फलक में हम एक मंच पर बैठे हुए एक दम्पत्ति को पाते हैं जिसमें पत्नी-पुरूश की गोर में बैठी है। इस कोल्हू में संतरासी का काम भी बहुत बारीकी से हुआ है।

                         जैसा कि हम ऊपर श्री रामकुमार यादव के कोल्हू की चर्चा कर चुके हैं उसी के एक फलक का उल्लेख हम यहाँ पर भी कर रहे है। इसमें एक फलक में एक नवयुवक एक बहंगी में स्त्री-पुरूश को लिए चला जा रहा है। इसमें इस युवक की आकृति परम्परागत ढंग से बनी होने पर उसकी कमर बहुत पतली दिखाई गयी है अतएव षरीर डमरू की तरह हो गया है। यह पन्द्रहवीं-सोलहवीं षती की भारतीय चित्रकला की समकक्ष है। बहंगी में एक ओर एक स्त्री और एक ओर एक पुरूश बैठा है। सम्भवतः यह श्रवण कुमार की कथा से सम्बद्ध है।   इसका अंकन बिल्कुल परम्परागत लोक षैली में है और आकृतियां जैसे लोक चित्रण में अथवा उन कोल्हूओं  के उत्कीर्ण फलकों में मिलती है।

                         सतलपुर में श्री दलईराम यादव के यहाँ का कोल्हू भी आकर्शक है जिसमें ऊपर चारखाने की चैड़ी पट्टी है, इस कोल्हू के दृष्य अधिक जटिल है, और कहीं-कहीं चेहरे के विवरण भी ठीक-ठीक दिखलाने की चेश्टा की गयी है, सारंगी जैसा कोई यंत्र भी बजाया जा रहा है।  इसी के नीचे वाले फलक में एक ओर नागो से लिपटे हुए स्त्री-पुरूश चले जा रहे हैं, बगल में बैठी हुई स्त्री एक पेड़ को सींच रही है सम्भवतः यह केला या ताड़ का पेड़ है। दूसरी स्त्री घड़े में पानी लेकर आ रही है। एक अन्य फलक में तामझाम (खुली हुई डोली) में एक स्त्री पुरूश जा रहे है। ऐसा प्रतीत होता है कि इनमें कोई कहानी या सांकेतिक दृष्य है, पर स्थानीय लोगों से पूछताछ करने पर कोई समाधान सम्भव न हो सका। 

                         जौनपुर के हसरौली ग्राम में कई कोल्हू के नमूने मिले जिसमें से कुछ की चर्चा ऊपर हो चुकी है, यहाँ हम संक्षिप्त एक कोल्हू की चर्चा करेंगे. इसमें सांप को खाता हुआ मोर अत्यन्त दर्षनीय है।  क्यों कि इसमें आकृति के मौलिक स्वरूप को अच्छी तरह पहचाना गया है और इसे एक लोक-कला पूर्ण आलंकारिक रूप भी दिया गया है। इसी प्रकार अन्य दृष्यों में हाथी भी बड़ें सुघड़ रूप में दिखलाया गया है, यद्यपि उसमें अलंकारों का अभाव है। इसी के बगल में दीवट के समान एक त्रिषुल भी बना है।  श्री कैलाष यादव मसीदा, जौनपुर के कोल्हू में नाव का एक रोचक दृष्य है। जहाँ जल का अंकन हुआ ही नहीं, पर नाव की विषेशताएं दिखलाते हुए मस्तुल तक दिखला दिया गया है, फिर भी नाव की डगमगाती हुई गति को अच्छी प्रकार व्यक्त किया गया है इस पर दो व्यक्ति सवार भी हैं। 

                       श्री दुखीराम यादव विषुनपुर जोनपुर के कौल्हू में आर्च ;।त्ब्भ्द्ध की लहर ने बहुत अधिक बढ़ाकर उसे बहुत अधिक अलंकारिक रूप दिया गया है। इसके नीचे एक स्त्री खड़ी है जिसके दोनो ओर एक-एक पुरूश है, स्त्री के ट्यूब की तरह उठे हुए हाथ पुरूशों के कन्धों पर जबकि पुरूशों के हाथ स्त्री की कमर पर है। सम्भवतः यह श्रृंगारिक दृष्य है। 

                        मुझे पोखरियापुर में एक कोल्हू मिला जिसकी पषु आकृतियाँ बहुत सुन्दर है। एक ओर एक हाथी, इसके बगल वाले फलक पर एक घोड़े की अत्यन्त सुन्दर आकृति है जो दुलकी चाल में चला जा रहा है इसकी गति बडें मार्मिक ढंग से दिखलाई पडती है। इस पर भी एक व्यक्ति एक बल्ली लिए खड़ा है यह भी सम्भव है कि सर्कस के समान किसी खेल तमाषे से यह दृष्य प्रभावित हो। यह कलाकार पषुओं की आकृति बनाने में दक्ष है, इसको कह सकते यहाँ मानव आकृतियाँ तो बिल्कुल परम्परागत है। इन दोनो के मेल से भी औत्सुक्यपूर्ण स्थिति पैदा होती है जो लोक संस्कृति और कला की एक विषेश पहचान है। 

                        आजमगढ़ के खान जहांपुर के एक कोल्हू पर घोड़े की बैली हाँकता हुआ एक पुरूश खड़ा है। यह अन्य प्रकार के कोल्हूओं से मिलता जुलता है, जिसमें चट्टे पर फैली हुई सतह दिखलाई पड़ती है। 
बड़ा गाँव आजमगढ़ में घोड़े पर बैठा हुआ एक व्यक्ति बड़े गर्व से दिखलाई पड़ता है।  यह भी कोल्हूओं के सामान्य चित्रण से मिलता-जुलता है। इसके पाष्र्व में कमल की घुमी हुई पंखुडियाँ बनी है। इस क्षेत्र में मध्यकाल में बनी हुई मूर्तियों में इस प्रकार के अलंकरण के बहुत निकट है। यह आष्चर्य का विशय है कि इस प्रकार की परम्पराएं कैसे लोक-कला में बची रह गयी है।

                      जौनपुर जिले के हीरापुर गाँव में केाल्हू का एक और अच्छा उदाहरण है। जिसमें सामान्य प्रकार के सभी दृष्य भाते हैं, परन्तु विषेश रूप से हम यहाँ एक घोड़ा गाड़ी का वर्णन कर रहे है। इसमें रथ की तरह घोड़े की पीठ पर जोर रखी हुई है, गाड़ी पर दो व्यक्ति बैठे है षायद स्त्री पुरूश भी हो सकते है। घोड़े की आकृति बहुत ही सुन्दर है जिसमंे थोड़ी स्वाभाविकता भी है। व्यक्तियों की आकृतियाँ कुछ परम्परा के अनुसार है। 

                         कोल्हूओं की चर्चा करते हुए हम यहाँ कुछ अन्य उदाहरणों की भी लेंगे, जौनपुर जिले के खमपुर ग्राम में एक कोल्हू मिला जिसमें एक व्यक्ति चला जा रहा है। यह सामान्य प्रकार का है। आकृतियाँ  बहुत सपाट हैं अर्थात रेखाओं का प्रयोग कम हुआ है आकृतियांें के धड़ डमरू के मसान है जो मुगल काल के जामे के समान कोई वस्त्र पहने हुए है। सम्भवतः सिर के ऊपर एक पगड़ी, आँखे गोल है, चेहरे का अन्दाज नाक के टुनगे और थोड़े से खुले हुए मुँह के द्वारा मिलता है। यह दृष्य लहरियादार कमानी के भीतर हे, इसके दोनोें ओर खड़ी चैड़ी पट्टियाँ है, जिनके द्वारा प्रत्येक दृष्य एक दूसरे दृष्य से अलग होता है। बायीं ओर इसी प्रकार का घुड़सवार व्यक्ति है, जो ओजपूर्ण है। यहाँ यह देखने योग्य है कि दोनों की गति की भिन्नता का बड़े सूक्ष्य रूप में परिचय दिय गया है। ऊपर स्थानीय प्रकार की कमल की पत्तियों की झालर है इसी कोल्हू में एक ओर नाचती हुई पतुरिया दिखाई गई है, जिसने अपने लहंगे के छोर को अपने हाथो्र में उठा लिया है, यह अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के चित्रों में आमतौर से मिलता है। यह भी सम्भव है कि इसका घाघरा, काछनी प्रकार का है। यद्यपि इस कोल्हू में सर्वत्र सपाट आकार है परन्तु इस घाघरे या काछिया को हल्की घुमावदार रेखाओं से बनाकर इसमें जान डाल दी गयी है। ऊपर यह जैसे बड़े पक्षी के दो पंखों के समान हो गया है। नाचने वाली के एक ओर सारंगी बजाने वाला दूसरी ओर तबला बजाने वाला है। ध्यातव्य है कि इन दोनों व्यक्तियों के सिर उठे हुए है, जैसे ये कुछ झूम रहे है। इसके अतिरिक्त सारंगी और एक तबले को कुछ टेढ़ा करके बनाया गया है।  जिससे  स्वाभाविकता है। इससे निश्कर्श निकलता है कि यद्यपि लोक कला में परम्परा का अधिकाधिक प्रभाव होते हुए भी कलाकार अपने चारों ओर के संसार को भलीभांति देखता था और अच्छा कलाकार उस दृष्य की छटा भी उपस्थित करता था। 

                         जौनपुर के खमपुर ग्राम में एक अन्य कोल्हू और जिसकी आकृतियाँ ऊपर दिये गये कोल्हू से बहुत मिलता-जुलता है। इससे परम्परा का प्रभाव और साफ तौर से जाहिर होता है, जिसके अन्तर्गत अनेक पत्थर काटने वाले एक ही प्रकार का काम करते थे। इस कोल्हू में भी उसी प्रकार की आकृतियां है जैसी हम पहले देख चुके है। घुडसवार, हाथीसवार इत्यादि। इनके चेहरे उपयुक्त प्रकार के मिलते है, परन्तु यहाँ प्रत्येक आकृति एक विषेश प्रकार की  पगड़ी पहने है जो अंगेजी हैट के समान है। प्रत्येक आकृति (मनुश्य और पषु) में जीवंतता है। प्रत्येक की भंगिमा और गति सजीव रूप से दिखलाई गयी है। इसमें एक स्थान पर चोंच में मरे साँप को पकड़े नृत्य करते दो मोर हैं, जो आमने-सामने खड़े है। जिसमें रेखाओं का सुन्दर प्रयोग किया गया है। यह भी दर्षनीय है कि प्रत्ये क मोर अलंकरण में विषेश रूप से पूँछ के अलंकरण में यह भिन्न है। इस कोल्हू में विषेश दर्षनीय है ऊपर की ओर मछलियाँ बनी है जैसे वे स्वच्छन्द जल में तैर रही है।

                       खमपुर ग्राम में ही एक अन्य कोल्हू है जो पूर्वोक्त प्रकार का है। इसमें विषेश रूप से घोड़े के रथ पर सवार लोगों के दृष्य मिले है। जो देखने योग्य है। घोड़े के घूमे हुए रूख को कोल्हू में बहुत ही सुन्दर ढंग से बैठाया गया है। रथ के लकड़ी के भाग में सुन्दर उमेठी हुई रेखाएं है। रथ पर एक व्यक्ति किसी मचिया पर बैठा हुआ हुक्का पीता हुआ दिखलाया गया है। पीछे स्त्री खड़ी है। बैठे हुए व्यक्ति का हाथ उसकी ओर श्रृंगारिक मुद्रा में बढ़ा हुआ है। इस कोल्हू में एक विषेश बात और दिखलाई पड़ी इसकी खड़ी पट्टियों में भी खड़ी मानवाकृतियाँ है। ये मानवाकृतियाँ डमरू प्रकार की हैं जो भिन्न-भिन्न है एक में भाला और माला लिए एक सिपाही खड़ा है, दूसरी ओर अंग्रेजी ढंग का कपड़ा पहने हुए संगीन धारी बन्दुक लिए हुए सिपाही खड़ा है। जौनपुर के खटहरा गाॅंव में एक कोल्हू मिला है, इसका उपयोग गाय की चराने के रूप में किया जा रहा है। यहाँ भी परम्परा के अनुसार आकृतियाँ बनी है। हाथीसवार मरे साँप को चोंच में पकड़ें मोर संगीनधारी सिपाही आदि। परन्तु इसका काम बहुत सूक्ष्म है और रेखाओं में सुन्दरता है। उदाहरण के लिए हम मोर को लें। इसमें मोर के पंखों को तथा कुण्डली मारे मृतक साँप को बहुत स्वाभाविक रूप में दिखलाया गया है। 

                     इसी गाँव में एक दूसरा बहुत अलंकृत कोल्हू है। इससे सम्भावना की जाती है कि यहाँ सौ वर्श पहले बहुत अच्छा सन्तराम था। और यह भी सम्भव है कि ये दोनों उसी की कृति हों परन्तु इसमें डिजाइनें भिन्न जान पड़ती है, अर्थात् परमपरा में विविधता भी थी। उदाहरण के लिए हम एक सजावटी डिजाइन को दे रहे है। इसमें एक फूला हुआ कमल है जिसकी आठ बड़ी और आठ छोटी पंखुड़ियाँ हैं और उसके ऊपर एक बेल है। पष्चात् चन्द्रमा और सम्भवतः तारा भी है, नीचे भी दो खिले हुए फूल हैं जिनको एक चापाकार रेखा से मिलाया गया है। यह डिजाईन बहुत ही सुन्दर रूप में बनाीय गयी है परन्तु यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि यह डिजाइन में सारनाथ से प्र्र्राप्त पहली ईसवी सदी पूर्व से पहली षती तक की आकृतियों में मिलती है जिसे ‘‘चक्षु’’ कहते है। 


(लेखकः प्रख्यात चित्रकार हैं, एम.एम.एच.कालेज गाजियाबाद मे चित्रकला विभाग के अध्यक्ष)  

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साक्षात्कार
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सोमवार, 28 मार्च 2011

सृजनशीलता कभी भोथरी नहीं होती

संवाद

सृजनशीलता कभी भोथरी नहीं होती

सुप्रसिद्ध चित्रकार लाल रत्नाकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत


लाल रत्नाकर












  क्या जीवन का अनुभव संसार और कला का अनुभव संसार दो अलग-अलग संसार हैं? इन दोनों के बीच आप कैसा अंतरसंबंध देखते हैं?
जीवन का अनुभव संसार मेरे लिए, मेरी कला के अनुभव संसार का उत्स है. अंतत: हरेक रचना के मूल में जीवन संसार ही तो है. जीवन के जिस पहलू को मैं अपनी कला में पिरोने का प्रयास करता हूँ, दरअसल वही संसार मेरी कला में उपस्थित रहता है. कला की रचना प्रक्रिया की अपनी सुविधाएं और असुविधाएं हैं, जिससे जीवन और कला का सामंजस्य बैठाने के प्रयास में गतिरोध आवश्यक हिस्सा बनता रहता है. यदि यह कहें कि लोक और उन्नत समाज में कला दृष्टि की भिन्न धारा है तो मुझे लगता है, मेरी कला उनके मध्य सेतु का काम कर सकती है.
  जब आप लोक और उन्नत समाज की कला दृष्टि की भिन्न धारा का जिक्र कर रहे हैं, तो क्या इसे इस तरह समझना ठीक होगा कि प्रकारांतर से आप यह भी कह रहे हैं कि परम्परा में, उन्नत समाज में लोक की उपस्थिति नहीं है या क्षीण है ?
मेरे कहने का आशय यह है कि लोक और नागर समाज की कला दृष्टि में भिन्नता है. लोक की आस्था सरलता और साधारणीकरण में है. इसके उलट नागर समाज में किसी खास किस्म की कृत्रिमता को अधिक स्थान मिला हुआ है.
  आप अपने कला के अनुभव संसार को किस तरह संस्कारित और समृध्द करते हैं?
मेरी कला का अनुभव संसार लोक है और लोक स्वंय में इतना समृध्द है कि उसे संस्कारित करने की जरुरत ही नहीं पड़ती. जहां तक मेरी कला सृजन का सवाल है तो वह ऐसे परिवेश और परिस्थिति से निकली है, जिसकी सहजता में भी असहज की उपस्थिति है.
  आप शायद अपने बचपन की ओर इशारा कर रहे हैं. मैं जानना चाहूंगा कि अपने बचपन और कला के रिश्तों को आप किस तरह देखते-परखते हैं
बचपन में कला दीर्घाओं के नाम पर पत्थर के कोल्हू की दीवारें, असवारी और मटके के चित्र, मिसिराइन के भित्ति चित्र आकर्षित ही नहीं, सृजन के लिए प्रेरित भी करते थे. गांव की लिपी-पुती दीवारों पर गेरू या कोयले के टुकड़े से कुछ आकार देकर जो आनंद मिलता था, वह सुख कैनवास पर काम करने से कहीं ज्यादा था. स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ रेखाएं ज्यादा सकून देती रहीं और यहीं से निकली कलात्मक अनुभूति की अभिव्यक्ति, जो अक्षरों से ज्यादा सहज प्रतीत होने लगी. एक तरफ विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की जटिलता वहीं दूसरी ओर चित्रकारी की सरलता. ऐसे में सहज था चित्रकला का वरण. तब तक इस बात से अनभिज्ञता ही थी कि इस का भविष्य क्या होगा. जाहिर है, उत्साह बना रहा.
ग्रेजुएशन के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और गोरखपुर विश्वविद्यालय में आवेदन दिया और दोनों जगह चयन भी हो गया. अंतत: गोरखपुर विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में प्रवेश लिया और यहीं मिले कलागुरू श्री जितेन्द्र कुमार. सच कहें तो कला को जानने-समझने की शुरुवात यहीं से हुई. फिर कानपुर से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कलाकुल पद्मश्री राय कृष्ण दास का सानिध्य, श्री आनन्द कृष्ण जी के निर्देशन में पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक कला पर शोध, फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में कला प्रदर्शनियों का आयोजन...तो कला के विद्यार्थी के रुप में आज भी यह यात्रा जारी है. कला के विविध अछूते विषयों को जानने और उन पर काम करने की जो उर्जा मेरे अंदर बनी और बची हुई है, उनमें वह सब शामिल है, जिन्हें अपने बचपन में देखते हुए मैं इस संसार में दाखिल हुआ.
• फ़ोटोग्राफ़ी के सहज और सुलभ हो जाने से ललित कलाएँ किस तरह प्रभावित हुई हैं? यदि आपकी विधा की बात करें तो इसने चित्रकार की अंतरदृष्टि को धारदार बनाया है या फिर उसे भोथरा किया है?
फोटोग्राफी का इस्तेमाल बढ़ने से कला प्रभावित हुई है, ऐसा नहीं लगता. हां, इसके कारण कलाकार को नये तरीके और प्रयोग करने की चुनौती मिली है, जिसने सहजतया कलाकार की अन्तर्दृष्टि को सूक्ष्म बनाया है. लेकिन मैं विनम्रता के साथ उल्लेख करना चाहूंगा कि मेरे साथ इससे इतर स्थिति है. मेरे कला प्रशंसक मित्रों का मानना है कि मेरे रेखांकन की प्रतिबध्दता को कैमरे ने कमजोर किया है, जबकि मामला इससे अलग है. रेखाओं की समझ कैमरे से नही आती है. कई बार कैमरा कमजोरी बन जाता है, जिसका दूसरे कई लोग लाभ भी उठाते हैं.
विकास की धारा विभिन्न रास्तों से गुजरती है. मानव मन की अभिव्यक्ति और यथार्थ की उपस्थिति दो स्थितियां हैं, जो समाज और कलाकार के मध्य निरंतर जूझते रहते हैं. ऐसे में समाज को फोटोग्राफी अक्सर उसके करीब नजर आती है. उसमें उसे तत्काल जो कुछ देखना है दिखाई दे जाता है. पल भर की मुस्कान, खुशी, दु:ख, दर्द के अलग अलग स्नैप संतोष देते होंगे, जिनको रंगो का ज्ञान, रेखाओं की समझ है, उन्हें कहां से फोटोग्राफी वह सब दे पायेगी.
इसलिए कलाकार की अर्न्तदृष्टि की उपस्थिति उसके चित्रों के माध्यम से होती है, जिसे उसने कालांतर में अंगीकृत किया होता है, विचार प्रक्रिया के तहत गुजरा हुआ होता है. ऐसे मे चित्रकार सहजतया अपने मौलिक रचना कर्म को तर्को की प्रक्रिया से गुज़ारता है, जिससे उसकी सृजनशीलता की विलक्षणता दृष्टिगोचर होती है. ऐसे में हम यह कह सकते है कि किसी भी प्रकार का आविष्कार या विकास जब भी किसी को अर्थहीन अथवा भोथरा साबित कर देता है तो यह प्रमाणित हो जाता है कि उसमें दम नहीं है. अन्यथा चित्रकार की अपनी धार होती है और अगर वह सृजनशील है तो वह कभी भोथरी हो ही नहीं सकती.
• आपने स्त्रियों पर काफी काम किया है, यदि मैं भूल नहीं रहा हूं तो आपकी पूरी एक श्रृंखला आधी दुनिया स्त्रियों पर केंद्रित है. आपकी स्त्री किससे प्रेरित है?
स्त्रियां जन्म से लेकर अब तक आकर्षित, प्रभावित और उत्प्रेरित करती आयी हैं परंतु इनकी अपनी व्यथा है, जिसे पढ़ना बहुत ही सरल होता है. मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि मैं पुरुषों को उतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता.
मुझे ऐसा लगता है कि स्त्री सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है. सौंदर्य और स्त्री एक-दूसरे के साथ उपस्थित होते हैं. ऐसे में सृजन की प्रक्रिया बाधित नहीं होती. मेरी स्त्रियां सीता नहीं हैं, कृष्ण की राधा नहीं हैं और न ही रानी लक्ष्मीबाई हैं. ये खेतों खलिहानों में अपने पुरूषों के साथ काम करने वाली स्त्रियां हैं.
• आपकी स्त्री कर्मठ और गठीली दिखाई देते है, एक तरह की दृढ़ता भी नजर आती है. आपकी स्त्री भद्रलोक की नारी नहीं है वह खेतिहर है, मजदूरी करती है, क्या ऐसा आपकी ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण है?
मेहनतकश लोगों की कुछ खूबियां भी होती हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है. यदि उन्हें चित्रित करना है तो उनके मर्म को समझना होगा. उनके लय, उनके रस के मायने जानना होगा. उनकी सहजता, उनका स्वाभिमान जो पूरी देह को गलाकर या सुखाकर बचाए हैं, दो जून रूखा-सूखा खाकर तन ढ़क कर यदि कुछ बचा तो धराऊं जोड़ी का सपना और सारी सम्पदा समेटे वो जैसे नजर आती हैं, वस्तुत: वैसी वो होती नहीं हैं.
उनका भी मन है, मन की गुनगुनाहट है, जो रचते है अद्भूद गीत, संगीत व चित्र जिन्हें लोक कह कर उपेक्षित कर दिया जाता है. उनका रचना संसार और उनकी संरचना मेरे चित्रों में कैसे उपस्थित रहे, यही प्रयास दिन-रात करता रहता हूं. मेरे ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने मतलब यह नहीं है कि मैं किसी दूसरे विषय का वरण अपनी सृजन प्रक्रिया के लिये नहीं कर सकता था पर मेरे ग्रामीण परिवेश ने मुझे पकड़े रखा.
• इसमें क्या संदेह है कि देह की एक लय होती है और उसका अपना एक संगीत होता है. लेकिन आपके यहाँ देह की लय लगभग अनुपस्थित है, वहाँ देह एक स्थूलता के साथ सामने आता है, न तो नारी देह में नाज़ुकी की लय है और न पुरुष में बलिष्ठता. अगर है तो वह आलाप नहीं विलाप है. क्या यह अनायास ही है या फिर आपने सायास इसे अपनाए रखा है?

लाल रत्नाकर

बेशक बिना लयात्मक्ता के कला निर्जीव होती है परन्तु मेरे हिस्से वाले जीवन में यदि कुछ अनुपस्थित है तो देह और देह की लय को निहारने की दृष्टि, परन्तु मैंने कोशिश की है उस जीवन के यथार्थ के सौन्दर्य को बिना प्रतिमानों के उकेरने की. यहां मेरे चित्रों के पात्र अपनी देह का अर्थ ही नही समझते. उनके पास देह तो है परन्तु उस देह का बाजार से क्या सम्बन्ध है वह नहीं जानते. जबकि बाजारीकरण उसी देह में लोच और अलंकारिकता की वह कुशलता भर देता है जिससे उसकी अपनी उपस्थिति गायब हो जाती है और प्रस्तुत होता है उसका वह सुहावना, सलोना और आकर्षक रूप जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी जिन्दगी में कहीं कुछ कमी ही नही है. जीवन के सारे द्वंद्व् खत्म हो गए हों.
अनेक चित्रकारों के आदिवासी स्वरूप मैंने देखे हैं, जिनमें वे चमचमाते हुए किसी स्वर्गलोक के लोग नजर आते हैं. ऐसे लोग जिन्हें न कोई काम काज करना है और न ही आनन्द मनाने के अतिरिक्त उनके पास कोई काम काज है. इसलिए मुझे किंचित अफसोस नहीं होता कि मैं उस सुकोमल नारी और बलिष्ठ पुरुष का प्रतिनिधित्व करूं. बल्कि उस यथार्थ के सृजन में सुकुन और शांति मिलती है जो चिन्तित है अथवा बोझिल है. जिनके पुरूष सारी बलिश्ठता श्रम के हवाले कर चुके हैं-रोग, व्याधि, कर्ज और समय की मार से.
• स्त्री आपकी कला के केंद्र में है और रंग बहुत गहरे हैं. इनमें आपस के रिश्ते को आप किस तरह रेखांकित करेंगे?
जिस स्त्री का मेरी कला से सरोकार है मूलत: वह रंगों के प्रति सजग होती है. उसे प्रारम्भिक रंगो से गजब का लगाव है, जिन्हें वह सदा वरण करती हैं. मूलत: ये मूल रंग इनके मूल में बसे होते हैं यथा लाल पीला नीला. बहुत आगे बढ़ीं तो हरा, बैगनी और नारंगी इनके जीवन में उपस्थित होता है. इसके सिवा उसके जीवन में जो रंग दिखाई देते हैं, वह सीधे सीधे कुछ अलग ही संदेश संप्रेषित करते हैं. इन रंगो में प्रमुख हैं काला और सफेद जिनके अपने अलग ही पारम्परिक सन्दर्भ हैं. इन रंगो के साथ उसका सहज जुडाव उसे प्रकृति और सत्य के समीप रखता है. उत्सवी एवं पारम्परिक मान्यताएं भी इन चटख रंगो को अंगीकृत करते हैं.
• समकालीन दुनिया में हो रहे बदलाव के बरक्स यदि आपकी स्त्री की ही बात करें तो इस बदलाव को किस तरह देख रहे हैं ?
आज के बदलते दौर में हमारी स्त्री उतनी प्रभावित नहीं हो रही है, लेकिन अगली पीढ़ी सम्भव है तमाम बदलते हुए सरोकारों को स्वीकार कर ले. हमारे सामने जो खतरा आसन्न है, उससे एकबारगी लगता है कि इस आपाधापी में उसकी अपनी पहचान न खो जाए.समकालीन दुनिया के बदलते परिवेश के चलते आज बाजार वह सामग्री परोस रहा है, जो उस क्षेत्र तो क्या उस पूरे परिवेश तक की वस्तु नही है. इसका मतलब यह नही हुआ कि मैं विकास का विरोधी हूं लेकिन जिन प्रतीकों से मेरा रचना संसार समृध्द होता है, उसमें यह बाज़ार आमूल चूल परिवर्तन करके एक अलग दुनिया रचेगा, जिसमें उस परिवेश विशेष की निजता के लोप होने का खतरा नजर आता है.
• चित्रकला एक तरह से साहित्य की पड़ोसी होती है, तो आप किन कवियों, कथाकारों को पढ़ते और गुनते हैं? क्या इससे आपकी कला प्रभावित होती है और यदि होती है तो किस तरह?
कबि और चितेरे की डाड़ामेडी' कहानी आपने ज़रुर पढ़ी होगी. मैंने भी पढ़ी है. और ठीक से जिसको पढ़ा है उसमें सबसे उपर मुंशी प्रेमचंद और रेणु का नाम आता है. उसी क्रम में शरतचन्द्र, रविन्द्र नाथ टैगोर, धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा को पढ़ने तथा समकालीन कथाकारों में कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, शिवमूर्ति, से. रा. यात्री, संजीव और कुंअर बेचैन के करीब होने का सुअवसर मिला है.
इन सभी के कथा-संसार ने मेरी कला को समृध्द किया है. इनके पात्र मुझे आमंत्रित करते हैं. नि:संदेह कला और रचनात्मकता के नाना स्वरुप एक-दूसरे के लिए एक अवकाश की उपस्थिति तो देते ही हैं.
• एक ऐसे समय में जब बाज़ार में करोड़ों रु. में कोई पेंटिंग खरीदी-बेची जा रही हो, कला के सामाजिक सरोकार को आप किस तरह देखते हैं ?
सदियों पुरानी कला का जो मूल्यांकन आज हो रहा है, वह कम से कम उस अनजाने कलाकार के लिए तो किसी भी तरह से लाभदायक नहीं है. दूसरी बात ये कि आज भी जिस प्रकार से बाजार में कला की करोड़ो रूपये कीमत लग रही है, उससे भले कलाकारों को प्रोत्साहन मिल रहा होगा, लेकिन यह शोध का विषय हो सकता है कि अंतत: बाज़ार में किसकी कीमत है? लेकिन इन सबके बाद भी हरेक कलाकार अपने समय के पृष्ठ तनाव से ही तो मुठभेड़ करता है. और इस पृष्ठ तनाव में उसका समाज और उसका सरोकार ही तो शामिल होता है.

• समाज का एक बड़ा वर्ग है, जिसके हिस्से में ज़िंदगी के दूसरे संघर्ष इतने बड़े हैं कि वहां कला के लिए कोई अवकाश नहीं है. आपके उत्तर को ही समझने की कोशिश करूं तो कला का बाज़ार और बाजार की कला की उपादेयता और कहीं-कहीं आतंक, अंतत: इस समाज को समृध्द नहीं कर रहे हैं. ज़ाहिर है, इसमें कला की जरुरत पर भी सवाल खड़े होते हैं ?

लाल रत्नाकर


जीवन के सारे उपक्रम अंतत: इस दुनिया को सुंदर बनाने के ही उपक्रम हैं. कला के विविध माध्यम कहीं न कहीं हमारे कार्य-व्यापार को और सरल ही बनाते हैं. इसकी जरुरत इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है, हां आपूर्ति जब-जब कटघरे में खड़ी होगी, तब-तब इस तरह के सवाल जरुर उपजेंगे.
• कला के व्यावसायिकरण पर काफी बहस हो चुकी है. फिल्मों और विज्ञापनों की बात करें तो इसमें नई तरह की रचनात्मकता दिखाई दे रही है जो कि आम आदमी के काफी करीब भी नजर आती है. दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि उनमें एक तरह का सामाजिक सरोकार नहीं तो सामाजिक हलचल तो दिखाई दे ही रही है. पेंटिंग के बारे में आप क्या सोचते हैं?
यह कहना संभवत: सही नहीं है कि वर्तमान समय में फिल्मों एवं विज्ञापनों में सामाजिक सरोकार बढ़ा है या वे जीवन के अधिक निकट आई हैं बल्कि वास्तविकता तो यह है कि वह आम आदमी के जीवन से दूर होती जा रही हैं. इनमें जिस आम आदमी की बात होती है वह शहरी मध्यवर्गीय समाज है. निम्न वर्ग, गांव और उसके आदमी, उसमें कहीं नहीं हैं. इस पर भी वह शहरी मध्यवर्गीय जीवन को नहीं वल्कि उसके सपनों को ही दिखाते हैं या यूं कहें कि सपनों का कारोबार करते है.
कमोबेश पेंटिंग का भी यही हाल है. आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां कला और कलाजगत के घाल-मेल को उजागर करती रहती हैं. कला में आज सामाजिक हलचल की जगह तिकड़मबाजी ने ले ली है. आज कला के बाजार में विविध प्रकार के द्वार खुल रहे हैं. जबकि कायदे से अभी तक चित्रकला की संभावनाओं पर बहस शुरु भी नहीं हुई है.
• राजनीतिक समाज और नागरिक समाज एक तरह से कला के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं. यहाँ तक कि अच्छी फ़िल्मों को भारत में कला-फ़िल्में कह कर एक तरह से हाशिए पर रख दिया जाता है और कहा जाता है कि वह कुछ ख़ास किस्म के लोगों के लिए बनाई गई फ़िल्म है, आम लोगों के लिए नहीं. कमोबेश यही स्थिति चित्रकला के साथ नज़र आती है जिसमें कला को समझने, सराहने और ख़रीदने का जिम्मा कुछ ही लोगों तक सीमित नज़र आता है. इस विद्रूपता को आप किस तरह देखते हैं?
आज की राजनीति में मुझे ऐसा नेतृत्व नहीं नजर आता, जो अपनी कला के कारण अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हो. हिंदी पट्टी में यह स्थिति और ख़राब है. नागर समाज में कला का यह स्वरुप और भी भोंडेपन के साथ उभर कर सामने आया है. चाहे वो वस्त्र का मामला हो या फिल्मों का. कला की दुनिया में एक खास किस्म का वर्ग उभर कर सामने आया है, जिसके लिए कला जीवन का विषय नहीं है. ऐसे वर्ग के लिए हरेक कला केवल निवेश का मुद्दा है.
• क्या आप ऐसा कोई समय आता हुआ देखते हैं जिसमें कला, बाज़ारनिष्ठ होते जा रहे समाज में आमजन तक पहुँचे, सभी उसे समझ सकें और उसकी सराहना कर सकें?
सिध्दांत के तौर पर कहें तो वह कला ही क्या जो आमजन के लिए न हो. लेकिन यह किंचित पीड़ा के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि कला और आमजन के बीच एक दूरी हमेशा से रही है और इसीलिए हमेशा से हमारे देश में कला को राजाश्रय में जाना पड़ा है. आमजनों के भरोसे कला का जीवित रहना न पहले संभव था और न अब है. इसलिए यदि समाज बाज़ारनिष्ठ होता जा रहा है तो यह एक शुभ संकेत इन मायनों में तो है ही कि शायद इसी तरह कला को राजाश्रय का मोहताज न होना पड़े. लेकिन जहाँ तक समझ का सवाल है तो इसके लिए जो संस्कार चाहिए, वो दुर्भाग्य से समाज में नहीं दे पा रहे हैं और इसलिए कला आमजन की समझ या पहुँच से दूर दिखाई देती है.
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लेख 
(राष्ट्रीय सेमिनार-राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय कांधला,मुज़फ्फरनगर ) 
महिलाओं की व्यापक सहभागिता और सांस्कृतिक संवर्धन
- डॉ.लाल रत्नाकर  
भारत में सदियों से सामाजिक स्तर पर विविध प्रकार का युद्ध चल रहा है जहाँ महिला, दलित और पिछड़े समान रूप से उससे प्रभावित हो रहे हैं, यहीं इनकी कुछ प्रतिभाओं की स्तुति करके बहुसंख्य को बड़े करीने से अपमानजनक अवस्थाओं में खड़ा करके यशस्वी होने का जो भ्रम उत्पन्न किये हुए है, उससे एहसास होता है की भारत आज भी 'मनुस्मृति' की जकड की जटिल मान्यताओं के आधार पर चल रहा है.
आज दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती, शक्ति, धन और ज्ञान की देवी के रूप में पूज्य हैं, इनकी प्रतीतात्मकता का पूरा शोषण पूंजी और धार्मिक धर्माधिकारियो के द्वारा किया जाता है. जबकि पूरी स्त्री जाती उन्ही के द्वारा नित्य अपमानित होती है. और यहीं से शुरू होती है वह जंग. यही कारण है कि भारत कि महिलाओं को भी भारतीय समाज की तरह बाँटकर रखा गया है. आज जब समस्त विश्व जागरूक हुआ हैं विविध सवालों पर तब भी भारत उसी तरह पिछड़ा है महिलाओं के सवाल पर. इन्ही बंटी हुयी महिलाओं की संवेदना के मध्य का है मेरा रचना संसार. इन्ही महिलाओं ने भारत के आधे कम अपने कन्धों पर उठाया हुआ है पर उनकी हिस्सेदारी के सवाल पर उन्हें तिरस्कार, उत्पीडन, दुराचार एवं बलात्कार के जटिलतम सन्दर्भों से गुजरना ही जीवन और मरण के मध्य का हिस्सा बन जाता है, इस तरह की सलीबों पर लटकी हुयी जिंदगी कैसे अपने धर्म का निर्वहन करती है यहीं से निकलती हैं वह संवेदनाएं जिन्हें हम देख पते हैं - माँ, बहन, पत्नी और बेटी के रूप में ही नहीं अनन्य रिश्तों में उतरती नारी क्या वास्तव में उक्त 'प्रपंचों' की अधिकारिणी है.
इन्हीं में से निकलती नारी आज क्या सदियों से अपने कौशल और सयंम से समाज को अपने को सहेजते जिस शक्ति का परिचय दिया है यही कारण है की पुरुषों को पछाड़ विविध क्षेत्रों में अग्रणी रहने की अपनी जगह बनाई है, इसमे उन नारियों का भी मान बढ़ाया  है जिसमे सदियों से सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की उनकी इक्षा की पूर्ति हुयी है.
आज का समाज नारी को प्रयोग और प्रदर्शन की सामग्री ठीक उसी तरह से बना रखा है जैसे दलितों और पिछड़ों को, जहाँ जहाँ स्त्री अपने पराक्रम के बल पर आगे आने की बात करती हैं, उसको वहाँ बांटने के सारे हथकंडे अपनाये जाते हैं वह संसद, समाज  या घर का  सवाल हो. 
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कला और समाज में शैक्षिक भविष्य की समस्या
डा.लाल रत्नाकर 

                     समकालीन कला पर विचार करने से पहले हमें भारतीय कलाओं के क्रमिक विकास के परिदृश्य को समझना होगा, जैसा कि सर्वज्ञात है कि सदियों से कला जगत का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। अतः जब भी किसी तरह के विकास की बात होगी और उनमें कला के विकास अवधारणओं की चर्चा हो या नहो फिर भी कलाओं की उपस्थिति तो अनिवार्य होगी ऐसे में भारत के सम्पूर्ण कला विकास को नजरअंदाज करना बेमानी ही होगा। यहां यह नहीं कहा जा सकता कि कलाओं के वर्गीकरण के पूर्व जो कलात्मकता आज इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है वह सहज आ जाती रही होगी अपितु उसके ज्ञान को देने की प्रविधियों को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता। कलाओं के समय समय की प्रगति एवं अवरोध इस प्रभावी भावना के निष्पादन में कालचक्र का अपना महत्व होता है अतएव इसमें उनकी दुरूहता जितनी भी आड़े आयी हो उससे उसकी रचना प्रक्रिया के कौशल को कमतर करके देखना हो सकता है आज प्रासांगिक न हो पर इसके रचना के कौशल ने कभी अपने को समाप्त नहीं होने दिया है, ज्ञान के इस अद्भुत स्वरूप पर मनीषियों की दृष्टि सम्भव है बहस को स्थान दिया हो पर रचना प्रक्रिया की जटिलता को जिन रचनाकारों ने गौरवशाली बनाया वास्तव में वास्तविक योगदान उनका है। 
                    उत्तरोत्तर नकारात्मक रवैये को यदि त्यागते हुए वैश्विक कला इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह तथ्य करीने से प्रमाणित होते हैं कि धर्म समाज और राज्य कला विकास की प्रक्रिया को जितना प्रभावित करते हैं उससे कहीं ज्यादा रचनाकार का कौशल। विज्ञान, साहित्य एवं परम्पराएं जब जब धर्म और समाज के पक्ष और प्रतिपक्ष में आती हैं तो उदारता अनुदारता अनिवार्य रूप से कलाओं की रचनात्मकता को प्रभावित करती हैं। यहां शिक्षा का महत्वपूर्ण स्वरूप भी सहज ही सम्मुख आता है जब हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं। इस अप्राकृतिक प्रक्रिया के चलते मौलिक प्रक्रिया के विस्तार की वजाय प्रतिरूपण और अलंकारिकता के वैभव का ही विस्तारित कला का स्वरूप ही अधिक प्रचलित हो पाया, यही कारण है कि कलाएं सामाजिक स्वरूप में स्वीकार्य तो रहीं पर उतनी विकसित न हो पाने का कारण कहीं न कहीं असमानता और मानसिक दिवालियेपन की कहानी कहती नजर आती हैं। यदि यह सब व्यवस्थित और उनमुक्त मौलिकता की स्थिति में होता तो भारतीय कला का गौरवशाली स्वरूप इतिहास के ही नहीं वर्तमान में भी दुनिया को दिशा देता। 
                     इतिहास के गर्भ में पल रहे भारत का कला वैभव विखरा पड़ा है, ठीक उसी तरह जैसे यहां का सामाजिक स्वरूप। जब भी हम इसका विस्तार और निरपेक्ष अध्ययन करेंगे तो अनोखा सच सम्मुख आएगा। इन्हीं विविधताओं को समेटे यहां का गौरवशाली समाज सदियों की मानसिक गुलामी एवं बदहाली में डूबा यह महान रचनाकार अपनी सीमाओं में सिमटा, देश की अनन्य बाधाओं, हमलों, लूट-खसोट और अराजकताओं के मध्य जो कुछ कर पाया वह यहां के साम्राज्यों मठाधीशों की जागिर के रूप में महफूज है। वह अपनी कहानी इतिहास के पन्नों की जुबानी भले ही वयां न कर पाया हो पर किसी न किसी रूप में उसकी दशा पर जिक्र आ ही जाता है यथा ताजमहल जैसी विश्वविख्यात रचनाकार के हाथों के कलम कर दिये जाने के उद्धरण भी मौजूद हैं। यहां भी कलाकार की वास्तविक दशा के रूप में निश्चित तौर पर जो यातना जाहिर हो रही है कमोवेश यही दशा आज तक बनी हुई है। अतः भारत अपनी कलाओं के विविध स्वरूपों की वजह से अपनी पहचान बनाने में सम्पूर्ण संसार में कामयाब जरूर हो रहा है, पर उसके निहितार्थ अलग हैं। यही कारण है कि दुनिया के विविध देशों में भारतीय कलाएं आज चर्चा में ही नहीं उनकी मांग भी बनी हुई हैं पर यदि इनके समग्र विकास की प्रतिबद्धता भी पारदर्शी होती तो कुछ और बात होती। हो सकता है कि यह उल्लेख कष्टकारी और अव्यवहारिक लगे जो अपने आप में उक्त तथ्यों को ही बल प्रदान करेगा आज नहीं तो कल।      
                   फिर भी इतिहास बताता है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और उनमें में जितनी विधाएं यशस्वी हुई हैं, उनमें ललित कलाओं का महत्वपूर्ण स्थान एवं योगदान रहा है। भारत का हर युग अपने समय में किसी न किसी रूप में कलाओं को समेटे हुए है, यहां पर समुचित रूप से देखा जाय तो निश्चित रूप से कलाओं से पटा पड़ा है। पर दुखद है कि जितना   ध्यान जाना था वह सम्भवतः नहीं जा पाया है। वैसे तो भारत के गौरवशाली इतिहास में यह उल्लेख है कि समय समय पर इन विधाओं पर ध्यान रहा है, जिसके कारण कलाओं की स्थिति विविध संकटों के समय में भी कुछ न कुछ नूतन ही प्राप्त किया है। यही कारण है कि भारतीय समाज के सांस्कृतिक परिवेश में व्यक्ति को साहित्य, संगीत  और कलाओं के बिना पशुवत रूप में देखा जाता रहा हो वहां कला की महत्ता स्वतः समृद्ध हो जाती है, यथा उसे प्रमाणित करते हुए ये पंक्तियां उक्त अवधारणा को पुख्ता ही करती हैं- 
                    साहित्य संगीत कला विहिनः। साक्षात् पशु पुक्छ विषाण हीनः।। 
                    यही कारण है कि भारतीय मानस कला रूपों को अपने जीवन के हर हिस्से में आभूषण के समान सजोकर रखा है शिलाखण्डों से लेकर देह तक का उपयोग इसके लिए किया गया है, भारतीय मानस का यही कला प्रेम विविध रूपों में प्रस्फुटित हुआ है, गीत संगीत नृत्य चित्र मूर्ति एवं स्थापत्य आदि में तथा दैनिक उपयोग की विविध सामग्रियां जिनमें आभूषणादि के अतिरिक्त नाना प्रकार के उपयोगिता की सामाग्रियों के अलंकारिक संसाधनों में ये विविध कला रूप प्रचुरता से प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि लोक और विशिष्ट में कला अभिप्रायों की तमाम समता दृष्टिगोचर होती है। जिसको कालान्तर में पुनः नवीनतम तरीके से सामंजस्य के साथ प्रयुक्त किया गया है। यहां प्रयुक्त कलात्मकता की विवेचना भी महत्व की है, जिसमें कालान्तर में बहुत परिवर्तन देखने को मिला है, यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि जिन कलारूपों की रचना समाज को प्रतिविम्बित करती थी वह धीरे धीरे विलुप्त हो रही है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि सामाजिक पहचान में भी कलाएं बहुत सहयोगी थीं जो चुपचाप अपना काम करती रहती थीं। 
                    इन कला रूपों के निर्माण की प्रक्रिया में कला शिक्षा की प्रक्रिया पर गौर करें तो अधिकांश में परम्परागत गुरू-शिष्य या पारिवारिक परम्परा में यह कलाएं आगे बढ़ीं जिससे सांस्कृतिक सम्पन्नता आयीं जिसे हम अपने भारतीय समाज के विविध जातीय कार्यों के पेशेवर विविधता के रूप में भी देख पाते हैं। यही इनके सीखने के केन्द्र रहे हैं जो इन्हें परम्परा से पीढ़ी दर पीढ़ी इसके सम्पन्न स्वरूप प्रदान करते आए हैं। जितने भी उदाहरण मिलते हैं सबमें इन्हीं परम्परागत रूप से दी जाने वाली शिक्षा आज भी महत्वपूर्ण है। इसीलिए गुरू शिष्य परम्परा या घरानों के रूप में जिन्हें इसका सम्मान मिला वे इस विधा और ज्ञान के प्रसार में निश्चित रूप से समर्पित लोग थे। जिन्हें उनके कौशल की वजह से ही जाना गया। यही कारण है कि वो आज भी उन्हीं महत्वपूर्ण रूपों मे मौजूद है। 
                   इस परम्परा को आगे बढ़ाने और परवान चढ़ाने में जो कलाकार आगे आए उन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा, यथा कला के नये आयाम, नए प्रतिमान, नये मायने और नवीन तकनिकियों की खोजकर उनका भरपूर प्रयोग किए। यही कारण है कि समकालीन कला अपने विविध स्वरूपों में नजर आनी प्रारम्भ हुई। अब कला के मायने केवल और केवल पुरातन अर्थ समेटे रूपाकार न रहकर विविध अवस्थाओं व्यवस्थाओं को चिन्हित कर उनपर कलाकृतियों का सृजन हुआ। बृहत्तता और सूक्षमता का सामंजस्य एक साथ सामने आया, वसुदेव कुटुम्बकम की अवधारणा बलवती हुयी। चिन्तन की दिशा बदली, विषय बदले, माध्यम बदले। यही कारण है कि गुरू-शिष्य कहीं न कहीं मन्द पड़ी स्वतन्त्र विचारों का प्रसफुटन होना प्रारम्भ हुआ जिससे पारिवारिक परम्परा भी कमजोर हुई। यही कला कालान्तर में समकालीन कला के रूप में प्रतिस्थापित हुई और उसके कलाकारों ने समकालीन विचारों को लेकर विविध तकनीकियों का उपयोग कर एक नयी धारा की शुरूआत हुई है।
                    कालान्तर में इनके चलते अनेक तरह बदलाव के साथ नवीन परिवर्तनों ने विभिन्न प्रकार के माध्यमों को भी आजमाया और इनके विभिन्न शिक्षण केन्द्रों में भी इस नए बदलाव की शुरूआत हुई। जो विभिन्न स्कूलों के रूप में सामने आए विशेषकर ब्रिटिश शासन काल में जिन पश्चिमोन्मुखी कला शिक्षण की शिक्षा को प्रारम्भ किया गया उनमें पारंगतता के उपरान्त भी केवल कला की पराधीनता की जिस विधा को भारतीय कला के स्थानापन्न करने के लिए जिन अनेक स्कूलों की स्थापना हुई थी वहीं धीरे धीरे नवीन अवधारणा ने जगह बनाई। उनकी उपस्थिति आज हमारे सम्मुख जिस रूप में है वह कितनी सुखद है उसका मूल्यांकन अलग तरह से किया जाना चाहिए। पर इनकी प्रासांगिकता तत्कालीन दौर में जो भी रही हो पर आज उनका स्वरूप काफी बदल गया है। जबकि संगीत और नृत्य के अनेक घराने आज भी अपनी महत्ता कायम किए हुए हैं। 
                    क्योंकि कला शास्त्रों से बहुुत पहले की चीज है अतः कलाओं की मूल्य दृष्टि एवं मानवीय उपयोगिता का सवाल हमेशा सृजन की संभावनाओं को स्थान प्रदान करता है, यही कारण है कि रचनाओं की विविधता का शास्त्रीय स्वरूप तय किए जाने के बाद भी वह उन नियमों को तोड़ती रही हैं। ‘‘रचनात्मकता का संबन्ध साक्षर या शिक्षित होने से जरा भी नहीं। सांस्कृतिक दृष्टि से नितांन्त असंस्कृत महाकवि र्भृहरि के पात्र,’’ बहुत से शिक्षितों के हाल सब जानते हैं।’’ 
                    कलाओं की मूल्य दृष्टि-हेमन्त शेष की पुस्तक उद्धृत यह अंश कला शिक्षा के स्वरूप को परिलक्षित करता है अब सवाल यह है कि कला आन्दोलनों की स्थिति को कला शिक्षा से कैसे जोड़ा जाय, यही भारतीय कला आन्दोलन की प्रासांगिकता को चिन्हित कराने में सहायक होगा जबकि समकालीन कलाकारों की सूची में जिन नामों को शरीक किया गया है उनपर सवाल उठेगे कि उनके मानदण्ड क्या हैं ? उनको समझने के लिए कला के विकास की अवधारणाओं को समझना होगा जिनकी वजह से कला में बदलाव उत्पन्न हुए। 
                   अब तक कि कला प्रक्रिया में 1947 के प्रोग्रेसिव ग्रुप में-के0 एच0 आरा, एस0 के0 भाकरे, एम0 एफ0 हुसेन, एच0 ए0 गैडे, एस0 एच0 रजा, एस0 एन0 सूजा जिन छह कलाकारों को प्रोग्रेसिव ग्रुप में सुमार किया जाता है वह जिन विशेषताओं की वजह से जाने जाते हैं। परन्तु प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप का 1956 में विभाजन और स्वाभाविक रूप से दूर हुए फीका, समूह के कलाकारों को अपनी व्यक्तिगत शैली बनाने में व्यस्त थे. पीएजी के साथ जुड़े कलाकारों की सूची में लगभग सभी महत्वपूर्ण कलाकार लगभग 1950 में बंबई में काम कर रहे कलाकारों को भी शामिल किया जा सकता है। छह संस्थापक सदस्यों के अलावा, जुड़े कलाकारों मंे निम्न कलाकारों के नाम भी समिमलित हैं-वी.एस. गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, अकबर पदमसी, तैयब मेहता, राम कुमार, बाल छाबड़ा के बीच भरोसा कर सकते हैं। यह प्रगतिशील समूह है, जो नए प्रतिभा को कोकून के बाहर उभरने में मदद किया था। कुछ तत्कालीन दौर के भारतीय कलाकारों की पीढ़ी जो पहले के कलाकारों ने जो उनके लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए उनकी अभिव्यक्ति के विविध प्रतिभाओं के मालिक है और भारतीय समकालीन कला के उन्नायक भी।        
                 आज कई ज्ञात अज्ञात भारतीय कलाकारों की व्यक्तिगत शैली है जिसे वे सक्षम करने में एवं आगे ले जाने में लगे हैं, और यह समाज में स्वीकृति प्राप्त करने के लिए निरन्तर यत्न कर रहे हैं। समकालीन कला आन्दोलन को आगे ले जाने में जिन कलाकारों ने अपना योगदान बेनामी या गुमनामी में किया है वह भी इस आन्दोलन के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 
                वर्तमान दौर का कलाकार उनसे दूर तो हुआ है परन्तु कलामूल्यों को लेकर नहीं, जबकि नयी पीढ़ी के दौर में रचना प्रक्रिया के तौर तरीकांे ने कई नये आयाम कला को दिए हैं जिनमें स्थान विशेष का जिक्र किया जाना उतना महत्व का नहीं है जितना उनकी प्रक्रियाओं का यह कार्य कमोवेश देश के हर हिस्से में हुआ है। जिनकी वजह से भारतीय कला ने अपनी उपस्थिति कायम की है। 
              वहीं दूसरी ओर जहां बड़े संस्थानों के कलाकार अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे और जिनसे ऐसा नहीं हुआ दोनो के अलग ग्रुपों ने कला जगत में अपनी छाप छोड़ी है उसका मूल्यांकन कब होगा इसकी घोषणा करना संभव नहीं है जब समकालीन व्यवस्था इन कलाओं के भविष्य से आंख मूंद लेती है तब कलाओं के पतन का दौर आरम्भ हो जाता है। 
              आगे समकालीन कला और कला शिक्षा पर नजर डालने पर कई तत्व सामने आते हैं जिनका उल्लेख यहां करना वाजिब होगा। आजादी के पूर्व और उसके उपरान्त जिस तरह से विविध क्षेत्रों में बदलाव शुरू हुए उनमें कला का स्थान भी महत्व का रहा है राष्ट्र्ीय कला अकादमी की स्थापना, विभिन्न विश्वविद्यालयों में कला शिक्षण की सुविधा तथा अनेक कला महाविद्यालयों की स्थापना। 
              इस बीच की कला उपलब्धियां और उनका मूल्यांकन किया जाय तो अनेक महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आते हैं। उन मनिषियों ने जिन्होंने भारतीय कला तत्वों एवं तकनीकी ज्ञान की स्थाई स्थापना के अध्ययन की नींव डाली होगी। परन्तु आज ये संस्थान उस समय की आकल्पित उक्त अवधारणा के उन स्वरूपों में जिस उत्थान की परि कल्पना की गयी थी उसका स्वरूप क्या हो गया है वह विचारणीय है।  उनकी अवधारणओं का जो प्रस्फुटन हुआ वह उन विकासशील स्वरूपों में न होकर जिन स्वरूपों में हुआ है वह किसी भी तरह भारतीय कला का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यहां विशेषकर बंगाल, बड़ौदा और मुंम्बई को लिया जा सकता है। परन्तु थोक में जिन कला प्रक्रिया को अनेक महाविद्यालयों में अपनाया जा रहा है, जिनकी दशा दिशा को समझने के लिए अनेक कला शिक्षण संस्थानों का नाम लिया जा सकता है। 
              इनके अतिरिक्त आधुनिक कला के बहाने समकालीन दौर की कला प्रक्रियाओं से विमुख अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थिति तो और भी सोचनीय है। जिस तरह इनके शिक्षण साम्राज्य स्थापित हुए उनके कर्णधारों ने कला को नहीं किसी और विन्दु को महत्वपूर्ण करके जिस अ-कला को ही बढ़ाया गया  है। यह भयावह दौर कला की इस वर्तमान स्थिति को इस स्थिति तक लाने में निश्चित तौर पर एक जटिल प्रक्रिया के अधीन आकर या होकर जहां तक पहुंचा है उसके अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। जिसके प्रभावी या अ-प्रभावी प्रभाव का मूल्यांकन कब होगा, कहना कठिन है। इसके और भी कारण हैं जिनमें विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों की जटिल कला शिक्षा व्यवस्था या यूं कहें कि व्यवसायिक अवस्था के कारण मौलिक पद्धतियों की वजाय निहायत व्यवसायिक आधार ने जो कमजोर आधार खड़ा किए हैं वह शैक्षिक प्रक्रिया को प्रभावित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यदि हम इसका अध्ययन निम्न विन्दुओं के आधर पर करें तो जो परिणाम सामने आएंगे उन्ही से सच्चाई का आकलन किया जा सकता है। यथा-  विद्यार्थी,शिक्षक,पाठ्यक्रम,क्लास,स्ंासाधन,परीक्षा प्रणाली एवं व्यवस्थागत मानसिकता का मूल्यांकन किया जाना आज की समकालीन कला के स्वरूप को स्पष्ट करता है। 
             जिनका मतलब सीधे सीधे कलाओं को दयनीय बनाकर अपनी चेरी बनाना मात्र रह गया है। यही कारण है कि इस तरह के संस्थान कलाओं की वजाय कलाओं की अनुकृति कराने के केन्द्र मात्र बनकर रह गए हैं। यही नहीं अब तो इनकी यही व्यवस्था गुरूशिष्य की परम्परा बन गयी है। इनके उदाहरण हमें अनेक कला शिक्षकों के रोने धोने में दिखाई ही दे जाता है यथा आजकल के बच्चों के पास वक्त ही नहीं है क्लास में ही नहीं आते हैं, गांव के बच्चे न जिनके पास सामग्री होती है और न ही उन्हें समझ, उनके गार्जियन भी ऐसे हैं, इसलिए पाठ्यक्रम ऐसा रखिए जिससे काम आसानी से निकल जाए। और आश्चर्य जनक यथार्थ से रूबरू होना पड़ा है इस कला शिक्षा के जिम्मेदार शिक्षक होने का अरमान रखने के कारण। यहां उस यथार्थ की वानगी - स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के कल शिक्षण की आवश्यक सुविधाओं पर नजर डालें तो उनका कोई मानदण्ड लिखित रूप में कहीं उपलब्ध नहीं है, पर प्रयोगात्मक कक्षाओं की सामान्य व्यवस्था अनेक उन्नत कला महाविद्यालयों तक में उपलब्ध नहीं है जो अपने आप में एक बड़ी विडम्बना है।           
              यदि इनके विस्तार की बात की जाए तो उत्तरोत्तर उन प्रवृत्तियों को ही बढ़ावा मिल रहा है जिसमें कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है। इनके स्पष्ट कारण जो दिखाई दे रहे हैं उनमें कला की शिक्षण संस्थाएं, उपयुक्त संसाधन और निपुड़ ज्ञानदाताओं की अनुपलब्धता भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इनसे भी महत्वपूर्ण यह है कि कलाकार बनने के लिए शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थी जो हैं वह या तो डिग्री के लिए अच्छे अंक पाने के लिए किसी न किसी प्रकार अपने कोर्स पूरे करते हैं। जबकि वे सब कलाकार के पाकर नौकरी के लिए। इसके विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जितने कलाकार इन क्षेत्रों में दिखाई देने चाहिए थे वास्तविकता उनसे परे हैं। जो इस प्रकार के कलाकार हैं वह सतह पर कितने नजर आते हैं उन परिक्षेत्रों में जहां पर कला के ऐसे संस्थान हैं। अनेक कला महाविद्यालयों में इन स्थितियों से भिन्नता दिखाई तो देती है। 
              यही कारण है कि जिस स्थान पर कला को होना चाहिए था आज वहां नहीं है। इन्ही कारणों से आज की कला शिक्षा में जिन मूल्यों की प्रतिस्थापना होनी चाहिए थी कहीं न कहीं उनका संकट उपस्थित है। पर नित नए संस्थान जन्म ले रहे हैं जहां केवल और केवल यह हो रहा है कि शिक्षण प्रशिक्षण की कला का विकास तो हो रहा होगा पर कला के शिक्षण प्रशिक्षण की कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है यही कारण है कि सारी प्रक्रियाएं ठहरी हुयी सी प्रतीत हो रही हैं। हो सकता है कल कोई कला जिज्ञासु आए और इनको झकझोरने की कोशिस करे। फिर इनकी नींद टूटे और कला सृजन की संभावनाओं की भी इन्हे भी चिन्ता हो जो केवल और केवल नौकरियों वाली कला शिक्षा, उपाधियां उपलब्धियों की जगह ले ली हैं ।
लेखक का परिचय 
अध्यक्ष 
असोसिएट प्रोफ़ेसर 
चित्रकला विभाग , एम्.एम्.एच.कालेज  गाजियाबाद
(चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से सम्बद्ध)
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नारीजाति की तरंगे-



               मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी ‘नारीजाति की तरंगे’ शीर्षक से ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन की कलादीर्घा 7 व 8 में 19 मार्च 2011 तक लगी। जिसमें महिलाओं की दशा दिशा पर मेरे तैलीय (आयल) एक्रेलिक, जलारंगीय (वाटर कलर) एवं रेखांकनों के चित्र प्रदर्षित हुए.  



               इस चित्र प्रदर्शनी में नारीजाति की तरंगे विषय को केन्द्र में रखकर चित्रों का चयन करके उन्हें प्रदर्शित किया गया है जिनमें भारतीय नारीजाति की विविध आयामी स्वरूपों का दृश्याकंन किया गया है जिनमें-यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है जिनमें जिस रूप में स्त्रियां जन्म से लेकर अब तक आकर्शित, प्रभावित और उत्प्रेरित करती आयी हैं परंतु इनकी अपनी व्यथा है जो पढ़ना बहुत ही सरल होता है. आप मान सकते हैं कि मैं पुरुषों को उतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता हूं । मैने बेशक स्त्रियों को ही अपने चित्रों में प्रमुख रुप से चित्रित किया है, क्योकि मुझे नारी सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है कहीं कहंी के फुहड़पन को छोड़ दंे तो वे आनन्दित करती आयी हैं जिसे हम बचपन से पढ़ते सुनते और देखते आए हैं यदि हम यह कहें कि नारी या श्रृंगार दोनों में से किसी एक को देखा जाए तो दूसरा स्वतः उपस्थित होता है ऐसे में सृजन की प्रक्रिया वाधित नहीं होती वैसे तो प्रकृति, पशु, पक्षी, पहाड,़ पठार और पुरूश कभी कभार बन ही जाते हैं. परन्तु शीतलता या सुकोमल लता के बदले किसी को चित्रित किया जा सकता है तो वह सम्भवतः नारी ही है.
                 मेरी स्त्रियां सीता नहीं हैं कृश्ण की राधा नहीं है और न ही रानी लक्ष्मीबाई हैं ये स्त्रियां खेतों खलिहानों में अपने पुरूषों के साथ काम करने वाली जिन्हें वह अपना राम और कृष्ण समझती हैं लक्ष्मीबाई जैसे नहीं लेकिन अपनी आत्म रक्षा कर लेती हैं वही मुझे प्रेरणा प्रदान करती हैं।

                 मेहनतकश लोगों की कुछ खूबियां भी होती हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है यदि उन्हें चित्रित करना है तो उनके मर्म को समझना होगा उनके लय उनके रस के मायने जानना होगा, उनकी सहजता उनका स्वाभिमान जो पूरी देह को गलाकर या सुखाकर बचाए हैं दो जून रूखा सूखा खाकर तन ढक कर यदि कुछ बचा तो धराउूं जोड़ी का सपना और सारी सम्पदा समेटे वो जैसे नजर आते हैं वैसे होते नहीं उनका भी मन है मन की गुनगुनाहट है जो रचते है अद्भूद गीत संगीत व चित्र जिन्हें लोक कह कर उपेक्षित कर दिया जाता है उनका रचना संसार और उनकी संरचना मेरे चित्रों में कैसे उपस्थित रहे यही प्रयास दिन रात करता रहता हूं. उनके पहनावे उनके आभूषण जिन्हें वह अपने हृदय से लगाये रात दिन ढ़ोती है वह सम्भव है भद्रलोक पसन्द न करता हो और उन्हें गंवार समझता हो लेकिन इस तरह के आभूषण से लदी फदी स्त्रियां उस समाज की भद्र मानी जाती है ये भद्र महिलाएं भी मेरे चित्रों में सुसंगत रूपों में उपस्थित रहती हैं मेरे ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने मतलब यह नहीं है कि मैं और भी विषय का वरण अपनी सृजन प्रक्रिया के लिये नहीं कर सकता था पर मेरे ग्रामीण परिवेश ने मुझे पकड़े रखा ऐसा भी नहीं मैंने छोटी सी कोशिश भर की है उनको समझने की।
                  जिस स्त्री का मेरी कला से सरोकार है मूलतः वह रंगों के प्रति सजग होती है उसे प्रारम्भिक रंगो से गजब का लगाव है जिन्हे वह सदा वरण करती हैं,मूलतः ये मूल रंग इनके मूल में बसे होतेे हैं यथा लाल पीला नीला बहुत आगे बढ़ी तो हरा बैगनी और नारंगी इसके सिवा उसके जीवन में जो रंग दिखाई देते हैं वह सीधे सीधे कुछ अलग ही संदेष सम्प्रेषित करते हैं इन रंगो मे प्रमुख हैं काला और सफेद जिनके अपने अलग ही पारम्परिक सन्दर्भ हैं .
                  इन रंगो के साथ उसका सहज जुडाव उसे प्रकृति और सत्य के समीप रखता है, उत्सव एवं पारम्परिक मान्यताएं भी इन चटख रंगो को अंगीकृत करते हैं।

                  आज के बदलते दौर में हमारी स्त्री उतनी प्रभावित नहीं हो रही है, लेकिन अगली पीढ़ी सम्भव है तमाम बदलते सरोकारों को स्वीकारे लेकिन निकट भविष्य में मूलतः जो खतरा दिखाई दे रहा है वह यह है कि इस आपाधापी में उसकी अपनी पहचान ही न खो जाए.समकालीन दुनिया के बदलते परिवेष के चलते आज बाजार वह सामग्री परोस रहा है जो उस क्षेत्र तो क्या उस पूरे परिवेश तक की वस्तु नही है इसका मतलब यह नही हुआ कि मैं विकास का विरोधी हूं लेकिन जिन प्रतीकों से मेरा रचना संसार समृद्ध होता है उसमें आमूल चूल परिवर्तन एक अलग दुनिया रचेगा जिससे सम्भवतः उस परिवेश विशेष की निजता न विलुप्त हो जाए।
                  सहज है वेशकीमती कलाकृतियां समाज या आमजन के लिए सपना ही होंगी मेरा मानना इससे भिन्न है जिस कला को बाजार का संरक्षण मिल रहा है उससे कला उन्नत हो रही है या कलाकार सदियों से हमारी कलायें जगह जगह विखरी पड़ी हैं अब उनका मूल्यांकन हीे भी तो उससे तब के कलाकारों को क्या लाभ. आज भी जिस प्रकार से बाजार कला की करोड़ो रूपये कीमत लगा रहा है बेशक उससे कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है वह उत्साहित होता है लेकिन यह खोज का विषय है कि यह करोड़ो रूपये किन कलाकारों को मिल रहे हैं. कम से कम समाज ने तो इसे सुन सुन कर कलाकार को सम्मान देना आरम्भ कर दिया है कल तक जहां कला को कुछ विशेष प्रकार के लोगों का काम माना जा रहा था आज हर तबके के लोग कलाकार बनने की चाहत रखते हैं इससे कलाकार की समाज में प्रतिष्ठा बढ़ी है। 

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